कोरोना ने हमसे बहुत कुछ छीना है...इनमें से कई चीजें तो हमें नजर आ रही हैं और कई नजर नहीं आ रहीं। उन्हीं में से एक हैं- राजस्थान के करीब 28 लाख बच्चे, जो 3 साल के होने के बाद भी कोरोना की वजह से अब तक स्कूल का मुंह तक नहीं देख पाए हैं।
डॉक्टर्स और मनोचिकित्सकों का कहना है कि बच्चा जब पहली बार स्कूल जाता है, तो स्कूल के माहौल और दूसरे बच्चों से बहुत कुछ सीखता है। अनुशासन में रहने, समय से काम करने और दोस्तों से चीजें शेयर करने जैसी तमाम अच्छी आदतें वहीं से विकसित होती हैं। ऐसे में जिन बच्चों को शुरुआती स्तर पर स्कूल का वातावरण नहीं मिल पाया, उनकी सीखन-समझने की क्षमता पर भी बुरा असर पड़ा है। पिछले सत्र के दौरान प्री-प्राइमरी के लिए निजी स्कूलों में 8,11,983 और सरकारी स्कूलों में 5,95,126 बच्चों ने एडमिशन लिया था। यानी एक साल में यह संख्या 14 लाख 7 हजार होती है, मतलब दो साल में करीब 28 लाख। क्योंकि तीसरी लहर में बच्चों को खतरा देखते हुए इस साल भी स्कूल खुलने की संभावना बेहद कम है।
मनोचिकित्सक; स्कूल का माहौल भी बहुत सिखाता है
एंट्री लेवल के बच्चे के सामने 2 टास्क होते हैं। एक सामान्य कोर्स। दूसरा माहौल से सीखना। स्कूल बंद होने से मिलने-जुलने, चीजें शेयर करने, नए माहाैल में ढलने, अनुशासन में रहने जैसे गुण पैदा होते हैं। उस पर फर्क पड़ेगा। ऐसे बच्चों के साइकोलॉजी डवलपमेंट पर भी फर्क पड़ेगा।
- डॉ. अनिल तांबी, मनोरोग विशेषज्ञ, मनोचिकित्सालय, जयपुर
शिक्षा विभाग; लर्निंग गैप पूरा करने को सेशन रखेंगे
एंट्री लेवल पर सिलेबस बहुत महत्वपूर्ण नहीं होता। बच्चे की ज्यादातर पढ़ाई स्कूल के वातावरण से ही होती है। इसलिए स्कूल बंद रहने से जो भी लर्निंग गैप रहेगा। उसको पूरा करने के लिए स्कूल खुलने पर अलग से सेशन रखे जाएंगे। इसकी योजना तैयार की जाएगी।
- सौरभ स्वामी, निदेशक, प्रारंभिक एवं माध्यमिक शिक्षा विभाग
स्कूल; वर्चुअल माध्यम से स्कूल-सा माहौल बनाते हैं
वर्चुअल माध्यम से प्री प्राइमरी के बच्चों को हम भावनात्मक रूप से एकदूसरे से जोड़ने का पूरा प्रयास करते हैं। शिक्षण के साथ-साथ कहानियों, कविताओं और नृत्य जैसी गतिविधियों से वर्चुअली स्कूल का माहौल तैयार करके उनकी प्रतिभा निखारते हैं। ताकि विकास में कोई कमी न रहे।
- ऊषा शर्मा, शिक्षाविद्-प्रिंसिपल, एसआरएन स्कूल जगतपुरा जयपुर
एसएमएस; ऐसे बच्चों पर असर की स्टडी भी कराएंगे
एंट्री लेवल के जो बच्चे एक बार भी स्कूल नहीं गए, उन पर स्टडी होगी। बच्चा स्कूल जाता है तो उसका सर्वांगीण विकास होता है। वह व्यवहार का तरीका और टाइम से काम करना भी सीखता है। घर पर रहने से कोई टाइम टेबल नहीं होता।
- डॉ. आरके सोलंकी, सीनियर प्रोफेसर एंड यूनिट हेड, मनोचिकित्सा विभाग, एसएमएस कॉलेज, जयपुर
छोटे बच्चों के लिए ऑनलाइन पढ़ाई कारगर नहीं, क्योंकि
- 1. स्क्रीन से पढ़ना मुश्किल होता है, ज्यादा देर एक जगह स्थिर नहीं बैठते हैं।
- 2. ऑनलाइन शिक्षण में केवल किताबी ज्ञान दिया जा सकता है, बच्चों को स्कूल का माहौल नहीं दिया जा सकता।
- 3. विद्यार्थियों का मूल्यांकन संभव नहीं है।
- 4. विद्यार्थियों को होमवर्क दे दिया है तो उसको जांचने में बहुत दिक्कत आती है।
- 5. ऑनलाइन शिक्षण में टीचर बच्चे पर पूरा ध्यान नहीं दे पातीं। ना ही छोटे बच्चों की आदतों के बारे में उन्हें पता चलता है।
- 6. बच्चे पढ़ाई को गंभीरता से नहीं लेते हैं।
- 7. स्क्रीन टाइम बढ़ने से आंखों में दिक्कत।

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