हमारे बड़े बुजुर्गों की यह मान्यता थी कि रात को सोते समय शैय्या के नीचे या सिरहाने, लोटे या किसी अन्य बर्तन में जल भरकर रखने से नकारात्मक ऊर्जा निष्क्रिय होती हैं। ऐसी अवधारणा है कि जल में आसपास के वातावरण में उपस्थित नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता होती है। हालांकि इसके ठोस वैज्ञानिक आधार होने की कोई जानकारी नहीं है।
सनातन धर्म में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सांयकाल रात्रि ढलने से लेकर, प्रातःकाल ब्राह्म-मुहूर्त बेला तक का समय दैत्य काल कहलाता है तथा रात्रि में इस अवधि के दौरान प्रेत, पिशाच, दैत्य तथा अनेक प्रकार की नकारात्मक उर्जा वातावरण में विचरण करती हैं। अनायास ही, जाने अन्जाने में उनके संपर्क में आ जाने से व्यक्ति विशेष प्रेत बाधा या अन्य प्रकार की नकारात्मक उर्जा से ग्रसित हो सकता है। इन्हीं बाधाओं से सुरक्षा व मानसिक शांति के लिए सोते समय सिरहाने अथवा पलंग या चारपाई के नीचे जल से भरा हुआ लोटा या बर्तन रखा जाता है। कुछ लोग धारदार चाकू या हथियार आदि भी सिरहाने रखते हैं क्योंकि उनका ऐसा मानना है कि ऐसा करने से बुरे सपने तथा प्रेतबाधा नहीं आती तथा कई प्रकार की अन्य बलाएं भी दूर रहती हैं।
सोते समय सिरहाने जल रखना, सुबह पूरे घर में गंगा जल या शुद्ध जल से छींटे देना, पूजा गृह में दीप व धूप जलाना, धूप जलाकर पूरे घर में घुमाना आदि कुछ ऐसी भारतीय परंपराएं हैं जिनका कि घर के वातावरण पर निश्चित सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

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