साल 1979 में चित्रकूट जिले के डोडा टिकरिया गांव में एक मजदूर के यहां बच्चा पैदा होता है। बच्चे के पैदा होने के दूसरे दिन उसकी मां मर जाती है। बच्चा बड़ा होता है। गांव में आठवीं तक की पढ़ाई करके इंटर करने बांदा चला जाता है। इसी बीच उसके पिता की भी मौत हो जाती है और गरीबी उस पर हावी हो जाती है। गांव वापस आ जाता है। हालत इतनी खराब हो जाती है कि कोई खाना देता तो ठीक नहीं तो भूखे पेट ही सो जाता। एक दिन पुलिस आती है और उसे पकड़ कर जेल में बंद कर देती है।
आज डकैत की कहानी-4 में कहानी उसी लड़के बबली कोल की जो बड़ा हो कर 7 लाख का इनामी डाकू बन गया। लोगों को आग लगाकर क्यों मारता था? आइए जानते हैं…
ददुवा को सामान सप्लाई करने लगा, पुलिस को भनक तक नहीं लगती
बबली कोल बुंदेलखंड की सबसे पिछड़ी जाति से ताल्लुक रखता था। पिता की मौत के बाद लकड़ी बेचने का काम करने लगा। जंगल जाता, लकड़ी इकट्ठी करता और सिर पर लड़की का गट्ठा रख गांव-गांव जाकर बेचता।
इसी बीच साल 2007 में ठोकिया डाकू की मदद करने के आरोप में पुलिस 28 साल के बबली को गिरफ्तार कर लेती है। दरअसल, ददुआ कभी-कभी अपनी गैंग के साथ डोडा गांव आता था। उसको पता चला बबली लावारिस है। बबली से अपनी जरूरत के सामान जंगल में मंगाने लगा। थोड़े बहुत पैसे भी दे देता था। धीरे-धीरे बबली उसके गैरकानूनी सामानों को भी जंगल तक सुरक्षित पहुंचाने लगा। कई दिनों बाद पुलिस को बबली पर शक हुआ और उसे धर लिया गया।
जेल में ठोकिया के गुर्गे लाले पटेल से मुलाकात होती है
जेल में उसकी मुलाकात ठोकिया के गुर्गे लाले पटेल से होती है। सिर्फ 6 महीने बाद बबली जेल से छूट जाता है। अब बबली लाले पटेल को जेल से छुड़ाना चाहता था। जेल में रहने के दौरान ही बबली को पता चल गया था कि कोर्ट में लाले की पेशी कब है। पेशी के दिन जब पुलिस लाले को कोर्ट ले कर जाती है, बबली पुलिस पर हमला कर देता है और लाले को लेकर फरार हो जाता है और पाठा के जंगलों को अपना अड्डा बना लेता है।
पहले जुर्म में पूरी ट्रेन ही लूट ली
जंगल पहुंचते ही बबली को पैसे की जरूरत पड़ती है। वह लाले पटेल के साथ 5 और लोगों का एक गिरोह तैयार करता है और एक दिन कामायनी एक्सप्रेस ट्रेन पर धाबा बोल देता है। ट्रेन में लाखों रुपए की लूट की वारदात से इलाके में दहशत फैल जाती है लेकिन पुलिस को ये पता नहीं चल पाता कि आखिर ये लुटेरा था कौन।
यूपी में सत्ता बदलते ही बबली पाठा के जंगलों का बादशाह बन गया
2007 से 2012 तक यूपी में मायावती की सरकार थी। मायावती ने डाकुओं के खिलाफ जमकर कार्रवाई की। ठोकिया और ददुआ जैसे खूंखार डाकुओं को मार गिराया। ठोकिया की मौत के बाद चंबल के बीहड़ की कमान उसके गुर्गे डाकू बलखड़िया ने संभाली। इसी बीच बबली कोल ने बलखड़िया की गैंग जॉइन कर ली और फिर 15 डाकुओं को साथ लेकर अलग से काम करने लगा।
यूपी में सरकार सख्त थी इसलिए बबली ने एमपी के जंगलों को अपना अड्डा बना लिया। मध्यप्रदेश में लगातार लूट अपहरण और हत्या जैसी घटनाओं को अंजाम देने लगा। साल 2012 में यूपी की सत्ता बदलते ही बबली ने अपने जीवन का सबसे बड़ा कांड कर दिया और बीहड़ का बादशाह बन गया।
पहले नाक काटी फिर पेट्रोल डाल कर आग लगा दी, गोलियां मारते हुए वीडियो बनवाया
5 साल तक बबली ने दर्जनों हत्याएं कीं। सैकड़ों लूट और अपहरण जैसी वारदातों को अंजाम दिया। जब मन करता अपनी गैंग के लड़कों से किसी को भी पिटवा देता। बबली ने मुखबिरी के शक में डोडा गांव के एक किसान को चौराहे पर खड़ा करके गोलियों से छलनी कर दिया था।
साल 2012 में बबली ने ऐसा कांड किया कि एमपी और यूपी की पुलिस सख्ते में आ गई थी। दरअसल, बबली ने टिकरिया गांव में एक ही परिवार के 5 सदस्यों को लाइन से खड़ा कर पहले उनकी नाक काटी। फिर उनके हाथों और पैरों पर गोली मारी। उसके बाद उनके ऊपर पेट्रोल डाल कर उन्हें आग के हवाले कर दिया। सबसे बड़ी बात ये थी कि उसने इस पूरी घटना का वीडियो बनवा कर शेयर करवाया था।
इस जघन्य हत्या ने कई जिलों के लोगों की नींद उड़ा दी थी। बबली हर जिले में अपना आतंक फैला चुका था। इस वारदात के बाद बबली साढ़े 6 लाख का इनामी डाकू बन गया था। उस पर साढ़े 5 लाख का इनाम उत्तर प्रदेश सरकार और 1 लाख मध्यप्रदेश सरकार ने रखा था।
अपने नाम का लेटर पेड जारी कर करता था वसूली
अब बबली के खौफ से बांदा, चित्रकूट, मानिकपुर, ललितपुर और सतना जैसे जिलों के लोग सूरज ढलते ही अपने घरों में कैद हो जाते थे। क्योंकि शाम होने के बाद बबली कोल का दिन शुरू होता और इसी के साथ मौत का नंगा नाच भी।
केवल 32 साल की उम्र में बबली पर 50 से ज्यादा हत्याएं, 24 से ज्यादा अपहरण मिलाकर कुल 150 केस दर्ज हो चुके थे। अब बबली अपने लेटर पेड जारी करने लगा था। लेटर पर रकम लिखता और व्यापारियों तक पहुंचवा देता। व्यापारी बिना कुछ सोचे उस तक मांगी गई रकम पहुंचा देते।
पुलिस भी नाम सुनते ही घबराने लगी थी, दो राज्यों की पुलिस मिलकर करती थी ऑपरेशन
एमपी-यूपी की एसटीएफ टीम लगातार उसकी तलाश में जंगलों की खाक छानती रहती थी। पुलिस बबली को ढूंढती उससे पहले बबली ही पुलिस को घेर लेता था। 22 मई, 2016 को उसकी पुलिस से मुठभेड़ हुई। पुलिस को मुंह की खानी पड़ी।
2018 में भी दोनों राज्यों की पुलिस ने ज्वाइंट ऑपरेशन चलाया, मुठभेड़ हुई। बबली ने थाना प्रभारी समेत 4 जवानों की हत्या कर दी। जानकार बताते हैं, “एक समय ऐसा आ गया था पुलिस भी उसके सामने जाने से कतराने लगी थी।”
लड़की और मोबाइल को ज्यादा देर पास नहीं रहने देता था
डाकू बनने से पहले ही बबली की शादी हो गई थी लेकिन वो एक साल से ज्यादा अपनी पत्नी के साथ नहीं रहा। वो अपनी पत्नी को पसंद भी नहीं करता था। बीहड़ों में वो कई लड़कियों से संबंध तो बनाता लेकिन उनसे कोई रिश्ता नहीं रखता। इसके अलावा वो कभी भी अपने पास मोबाइल भी नहीं रखता था। उसने अपनी गैंग को लड़की और मोबाइल से दूरी बना कर रखने के निर्देश दे रखे थे। हालांकि बाद में कुछ जानकारों ने बताया था कि उसकी एक गर्लफ्रेंड भी थी जिसका नाम गुड़िया कोल था। किसी का अपहरण करता था तो उसी के फोन से फिरौती की मांग करता था।
वो कांड जो बबली की मौत की वजह बना, कमलनाथ ट्विटर पर दे रहे थे अपडेट
अगस्त 2019 में बबली यूपी, मानिकपुर के एक मावा व्यापारी का अपहरण कर फिरौती वसूलता है। इसके ठीक 15 दिन बाद सितंबर 2019 में एमपी के सतना के धारकुंडी थाना के हरसेड गांव के एक किसान अवधेश द्विवेदी को रात 2 बजे उनके घर से उठा लेता है। अपहरण के बाद बबली 50 लाख की फिरौती मांगता है।
इस घटना के बाद उस समय सूबे के मुख्यमंत्री रहे कमलनाथ एक्टिव हो जाते हैं और पुलिस की 6 टीमों को पाठा के जंगलों में उतार देते हैं। यूपी सरकार से भी मदद मांगी जाती है। कमलनाथ ट्विटर के जरिए लगातार अपडेट देने लगते हैं।
कई घंटों की मुठभेड़ के बाद हो पाया एनकाउंटर
कमलनाथ सरकार आईजी चंचल शेकर को इस ऑपरेशन की जिम्मेदारी सौंपती है। पुलिस के पास बबली की कोई ताजी तस्वीर नहीं थी इसलिए वो मुखबिरों का सहारा लेती है। बबली की गैंग का ही एक सदस्य लाली कोल उसकी मुखबिरी कर देता है। पुलिस बबली को ट्रेस कर लेती है।
मारकुंडी थाना क्षेत्र के बदरसुआ से लेकर लेदरी के जंगल तक लगातार कई घंटों की मुठभेड़ होती है। कुछ घंटों बाद लेदरी के जंगल में बबली और उसके एक साथी डेढ़ लाख के इनामी लवलेश कोल की लाश मिलती है। एसपी रियाज इकबाल इन दोनों खूंखार डकैतों की मौत की पुष्टि कर देते हैं।
लेखक: आशीष उरमलिया

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