ग्वालियर शायर जमील मजहरी लिखते हैं 'जलाने वाले जलाते ही हैं चराग आखिर, ये क्या कहा कि हवा तेज है जमाने की।" ईओडब्ल्यू के उन अफसरों को इससे प्रेरणा जरूर लेना चाहिए जो नगर निगम के घूसखोर सिटी प्लानर प्रदीप वर्मा कारनामों की पड़ताल कर रहे हैं। अवैध निर्माण कराने के एवज में पांच लाख रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा गया वर्मा मछली नहीं भ्रष्टाचार की शार्क निकला। पैन ड्राइव, लैपटाप और फाइलें जैसे-जैसे राज उगल रही हैं, जांचकर्ताओं को भी पसीने आ रहे हैं। वजह है वर्मा से हिस्सा लेने वालों की फेहरिस्त के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। निगम के अधिकारियों के साथ ही भोपाल तक के अधिकारियों, नेताओं के नाम हैं। अब ईओडब्ल्यू पर पूरा दारोमदार है कि या तो इस कांड का हश्र भी हनीट्रैप जैसा कर दे या रैकेट का भंडाफोड़ कर खुद को देश की सर्वश्रेष्ठ जांच एजेंसी साबित कर दे।
टेंपो में धक्के खाना शहर की नियतीः विजन डाक्यूमेंट बनाने में जुटे शहर के कर्ताधर्ताओं यानी सांसद, मंत्री, विधायक, कलेक्टर, एसपी से अनुरोध है कि पहले शहर के बेसिक्स पर ध्यान दीजिए। क्या आपने कभी सोचा कि वह कौन सा कारण है कि ग्वालियर प्रदेश का इकलौता बड़ा शहर है, जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट ही नहीं है। हर दिन हजारों लोग धुआं उगलते ठसाठस भरे टेंपो में बैठकर आपको कोसते हुए सफर करते हैं। क्यों आपको फर्क नहीं पड़ता कि स्मार्ट सिटी द्वारा सिटी बस शुरू होते ही उस पर परिवहन माफिया द्वारा खुलेआम हमले होना शुरू हो जाते हैं। एंटी माफिया की टारगेटेड कार्रवाई कर रहे हैं करिए, लेकिन थोड़ी सी नजरें टेढ़ी परिवहन के माफिया पर भी कर लीजिए। यहां का परिवहन सुधार दिया तो आपके भोपाली आका खुश हों या न हों, लेकिन लाखों शहरवासी लंबे समय तक आपको याद रखेंगे। काम की असली संतुष्टि मिलेगी सो अलग।
आगे पाठ, पीछे सपाटः 'आगे पाठ, पीछे सपाट" कहावत शहर में खासी चरितार्थ हो रही है। सड़क पर वाहन पार्क न हों, इसलिए हाई कोर्ट ग्वालियर ने आदेश दिया कि सभी व्यावसायिक भवनों के तलघरों का उपयोग सिर्फ और सिर्फ वाहन पार्किंग के लिए ही हो। नगर निगम ने आनन-फानन में तलघरों में चलती हुईं दुकानों को तोड़ दिया। लिखित में हाई कोर्ट को भी बता दिया- मी लार्ड आदेश की तामील कर दी गई है, लेकिन कुछ दिन बाद ही दुकानें जस की तस सज गईं। पार्किंग क्यों नहीं हो रही पूछने पर निगम ने कह दिया- यातायात विभाग कराए। कुछ ऐसा ही माफिया अभियान का हाल है। पिछली सरकार द्वारा अतिक्रमण से मुक्त कराई सैकड़ों बीघा सरकारी जमीन पर फिर कब्जा हो चुका है, जो अभी मुक्त कराई जा रही है, उस पर कुछ दिनों बाद कब्जा हो जाएगा। अच्छी पहल का दुखद अंत ऐसा ही होता है।
दिन ढल जाए हायेः ज्योतिरादित्य सिंधिया कब केंद्रीय मंत्री की शपथ लेंगे, हारे हुए मंत्रियों को कब निगम मंडलों का प्रभार मिलेगा, जीत कर आ चुके पूर्व मंत्री को शपथ दिलाने में लेटलतीफी क्यों? राजनीतिक हल्कों के यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिन पर जितनी भाजपा में चर्चा हो रही है उतनी ही कांग्रेस में है। मंत्री की कुर्सी नहीं मिलने के कारण, जहां कांग्रेस तंज कसने का मौका नहीं छोड़ रही, वहीं सिंधिया समर्थकों की सांसें भी ऊपर-नीचे हो रही हैं। रातें चिंता में बीत रही हैं, इधर बंगले खाली करने के नोटिस दिन का मिजाज बिगाड़ रहे हैं सो अलग । हालांकि सूची लेकर शिवराज सिंह चौहान दिल्ली हो आए हैं। सिंधिया की भी एक दौर की बातचीत भोपाल में उनके साथ हो चुकी है, इसलिए पहले उनके समर्थकों को सेटल किया जाएगा, उसके बाद मोदी टीम में सिंधिया शामिल होंगे। हालांकि होगा अब नये साल में ही।

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