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शिवपुरी : आदर्शों को विस्मृत करने वाला समाज पतन की ओर , संघ


 जो समाज और राष्ट्र अपने आदर्शों और महापुरुषों को विस्मृत कर देता है उसका पतन निश्चित है। भारत के आदर्शों और महापुरुषों को समाज के मन मानस से ओझल करने के षड्यंत्र सदैव भारत के अंदर होते रहे हैं। आजादी के पहले विदेशी ताकतें भारत के इतिहास को गलत ढंग से प्रस्तुत करती रहीं।

वहीं आजादी के बाद भी यह कुत्सित प्रयास कभी बंद नहीं हुए। 1857 की क्रांति को एक सिपाही विद्रोह के रूप में प्रचारित और प्रसारित किया गया, किंतु आज सकारात्मक शोधों का प्रामाणिक परिमाण परिणाम है कि इन षड्यंत्रों की परतें आज खुल रही हैं। सत्य उजागर हो रहा है। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य भारत प्रांत के संपर्क प्रमुख अनिल डागा ने कार्यक्रम को संबोधित कर कही।

श्री डागा ने हुतात्मा प्रणाम के पश्चात स्वयंसेवकों को संबोधित कर कहा कि भारतीय इतिहास की प्रथम स्वाधीनता समर के महानायक हैं। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान के पश्चात भी डेढ़ वर्ष तक उन्होंने गोरिल्ला युद्ध के जरिए अंग्रेजी सेनाओं पर कई सौ बार आक्रमण तात्या ने किए और उन्हें नेस्तनाबूद किया।

स्थानीय क्रांतिकारियों के विषय में आज बहुत शोध की आवश्यकता है, क्योंकि भारत में लाखों क्रांतिकारियों ने अपना बलिदान दिया, किंतु कई बलिदानी वीर आज भी अज्ञात हैं, क्योंकि उनके विषय में ना ही किसी ने लिखा और ना ही शोध किया। इसी कारण समाज के अंदर अमर शहीदों के बलिदानों का उचित मूल्यांकन नहीं हो सका है।

श्री डागा ने कहा कि आज विश्व के अंदर सामरिक युद्धों से भी बढ़कर एक वैचारिक युद्ध चल रहा है। दुनिया की बड़ी शक्तियां अपने अहंकार को तृप्त करने के लिए और संसाधनों पर कब्जे के लिए अन्य देशों की सत्ताओं को अपदस्थ करने के लिए नैरेटिव वाॅर कर रही हैं, यह बहुत खतरनाक है। भारत के भीतर भी यह वैचारिक युद्ध बड़ा हो चुका है भारत के आदर्श मान बिंदुओं और महापुरुषों के विषय में अनुचित प्रचार-प्रसार और लेखन किया जा रहा है।

जिसका पुरजोर जवाब समाज को ही देना होगा। इसके लिए समाज को अध्ययनशील और शोधसील बनना होगा। आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष चल रहा है। कई महापुरुषों और बलिदानियों का जीवन उद्घाटित हो रहा है। अज्ञात वीरों के बारे में जानकारियां प्राप्त हो रही हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित थे

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