आखिर लापरवाही का जिम्मेदार कौन ?
_' साहब मैं आदिवासी हूं'_
_खुद नहीं पढ सका, सोचा बच्चे को पढ़ाऊंगा। अंग्रेजी में पढ़ाऊंगा!_
पर क्या करूं प्रायवेट स्कूल में पढ़ाने को पैसे नहीं हैं, और सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं हैं!
सुना था, मामा ने अच्छी व्यवस्था करी है आदिवासियों के लिऐ। सोचा, शहर में ही पढ़ाऊंगा अपने लाडले को!
हां वहीं ठीक रहेगा।
👉बच्चा 60 किलोमीटर दूर रहेगा, तो क्या? पर अच्छी पढ़ाई तो करेगा''!
👉"बच्चा घर से दूर रहेगा आश्रम में, तो क्या? घर जैसी व्यवस्था में अच्छी पढ़ाई तो करेगा"!
👉"बच्चा अपने मां -बाप के साथ नहीं सोएगा, तो क्या? मां-बाप जैसे गुरुओं की नज़र में तो रहेगा"!
👉"बच्चा हमसे दूर रहेगा, तो क्या? हमारे जैसा मज़दूर तो नहीं बनेगा"!
और न जानें क्या -क्या कहा इस गरीब बाप ने।
पर उस बाप के सपनों पर जब पानी फिरा, तो रूधन कंठ से कह बैठा एक मजबूर बाप।
😢- कैसे पढ़ाऊंगा अपने लाडले को इस माहौल में जहां बच्चे को गहरी चोट आ जाए, औेर इनके पास इलाज कराने को पैसे तक नहीं हैं?
ये भाषा उसी मजबूर बाप की है, बस शब्द हमारे हैं।
✊ *पूछता है हर बाप*!
- क्या ऐसा ही करते हो अपने जिगर के टुकड़े के साथ?
- तुम भी तो बाप होगे तो क्या कलेजा नहीं पसीजा तुम्हारा जब पूरी रात और आधा दिन एक 6 साल का बच्चा दर्द से तड़पता रहा?
-वो बच्चा कैसे पूरी रात सोया होगा बिना किसी दर्द निवारक दवा के, जिसके आंख और सिर के बीच मे सरिए से कट का गहरा घाव हो?
- क्या तुम्हारे बच्चों के साथ ऐसा होगा तो तुम सो पाओगे सारी रात? जब उसके मां - बाप को पता चला तो कैसी कटी होगी वो रात?
हम पर इलाज कराने को पैसे नहीं कितनी आसानी से कह दिया तुमने ये वाक्य?
- क्या तुम अपनी औलाद के लिए यह कह पाते?
अरे शर्म करो जिम्मेदारों इतना तो कोई जानवरों के लिऐ भी कठोर नहीं होता, जितना तुम एक अबोध बालक के लिऐ कठोर बने!
अपने गंभीर अपराध का बोध करो, और अपने लिऐ सजा का निर्णय खुद करो।
ये मत भूलो की ईश्वर नाम की भी कोई चीज़ है!
मासूम की बददुआ इतनी जल्दी लगेगी, कि पता भी नहीं चलेगा।
हमने प्रभारी संयोजक आदिम जाति कल्याण विभाग महेंद्र जैन को सारा वाक्य कह सुनाया। उन्होंने शो कॉज नोटिस देकर कहा, मैं बस यही कर सकता हूं मामला गंभीर है इसे सस्पेंड होना चाहिए पर ये अधिकार कलेक्टर साहब के पास हैं वो इशारा कर दें मैं आधा घंटा भी नहीं लगने दूंगा। हमने अपना काम कर दिया है, अब माननीय कलेक्टर साहब को अपना काम करना है।
ऐसे दुष्टों को सही सबक सिखाना है, या फिर ऐसे जघन्य मामलों से पल्ला झाड़ना है।
*वीरेन्द्र चौहान*
*(लेखक)*
*"चर्चित की चर्चा "*

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