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जानिए बारिश को लेकर बार-बार क्यों गलत हो रही है मौसम विभाग की भविष्यवाणी

नई दिल्ली। दक्षिण-पश्चिमी मानसून केरल में करीब एक हफ्ते की देरी के साथ 7 जुलाई को पहुंचा. लेकिन इसके बाद भी मौसम के हालात ठीक नहीं दिख रहे हैं. दरअसल भारत में नवंबर, 2018 से मार्च 2019 के बीच मौसम सबसे कम बारिश हुई थी, जिसके चलते पानी के ज्यादातर बड़े स्त्रोत सूख चुके हैं और एक अच्छे मानसून की देश को जरूरत है.
मानसून के दौरान 27 जून तक जितनी औसत बारिश हो जाया करती थी, उसके 2/3 से थोड़ी ही ज्यादा बारिश अभी तक हुई है. ऐसे में चेन्नई सहित कई जगहों पर बड़े स्तर पर पानी की कमी हो गई है. इसके अलावा भारत के अलग-अलग मौसम जोन में 80% तक कम बारिश दर्ज की गई है. जुलाई और अगस्त महीने मानसून के लिए बहुत जरूरी हैं. भारत में जून से सितंबर के बीच मानसून के दौरान होने वाली कुल 89 सेमी बारिश का 66% इन्हीं दो महीनों में होती है. इस साल, भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने मई में भविष्यवाणी की थी कि इस बार जुलाई में होने वाली कुल बारिश का मात्र 95% और अगस्त में होने वाली बारिश का 99% बारिश ही होगी.
इसका अनुमान अप्रैल में अलनीनो की स्थिति को देखते हुए लगाया गया था. अलनीनो को भारत में बारिश को कम करने वाले एक कारक के तौर पर देखा जाता है. लेकिन इसके अलावा भी कई कारक होते हैं जो मानसून के कमजोर होने के लिए जिम्मेदार होते हैं. मई में IMD ने कहा कि भारत में जून से सितंबर के दौरान सामान्य बारिश होगी. हालांकि मौसम विभाग ने जून के बारे में कोई निश्चित आंकड़ा नहीं बताया था. ऐतिहासिक तौर पर जून में होने वाली बारिश का आगे के महीनों में होने वाली बारिश से कोई संबंध नहीं देखा गया है.
इसके अलावा अरब सागर में बना और गुजरात में आया चक्रवात ‘वायु’ भी मानसून के आगे बढ़ने के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ था. जैसे कि अभी पाकिस्तान के रास्ते जम्मू-कश्मीर और उत्तर भारत के कुछ इलाकों में आने वाला पश्चिमी विक्षोभ फिलहाल मानसून को आगे बढ़ने से रोक रहा है. मानसून केरल के रास्ते भारत आता है और यहां से पश्चिमी घाट की ओर बढ़ता है. इस दौरान मानसून की एक धारा जो दक्षिणी भारत से पूर्वी भारत की ओर बढ़ती है, वह ठीक कर रही है. मानसून अभी तक भारत के पूरे दक्षिणी और पूर्वी भाग में पहुंच चुका है. 15 जुलाई तक मानसून के इसके आखिरी मुकाम राजस्थान तक भी पहुंच जाने के आसार हैं. लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि यहां पहुंचने में मानसून को अभी देरी होगी. आगे के हफ्तों में मानसून के मध्य भारत और ज्यादातर गुजरात और उत्तरप्रदेश में पहुंचने की उम्मीद है. जबकि इसका तेजी से ज्यादा भारत में फैलना भी फायदेमंद नहीं है
क्योंकि इससे बारिश की मात्रा में कमी आ जाएगी. भारत के 36 में से केवल 2 मौसम उपविभागों ने अभी तक साधारण बारिश के स्तर की जानकारी दी है, जबकि 27 ने बहुत कम बारिश होने की शिकायत की है. 30 जून तक बंगाल की खाड़ी के ऊपर एक कम दबाव का क्षेत्र बनने की उम्मीद है, जिसके बाद मानसून तेजी से आगे बढ़ेगा. 2010 तक IMD के पास मौसम की भविष्यवाणी का केवल एक तरीका था. इसे स्टैटिस्टिकल मॉडल कहते थे. इसमें मौसम के अलग-अलग पैरामीटर्स को मानसून की प्रगति के साथ मिलाया जाता था. उदाहरण के तौर पर, उत्तरी अटलांटिक महासागर और उत्तरी प्रशांत महासागर के तापमान के बीच के अंतर का अध्ययन किया जाता था. इसके अलावा भूमध्यसागरीय प्रशांत महासागर में गर्म पानी का अध्ययन किया जाता था और यूरेशिया में पड़ी बर्फ का अध्ययन किया जाता था. इसके अलावा पिछले सालों की बारिश से इन आंकड़ों को मिलाया जाता था.
लेकिन ये आंकड़े बार-बार गलत साबित हो रहे थे और भारतीय मौसम विभाग कई बार सूखे और बारिश की कमी के बारे में बता पाने में असफल रहा था. ठीक-ठीक कहें तो 2002, 2004 और 2006 ऐसे साल रहे, जब भारतीय मौसम विभाग बुरी तरह से सूखे के बारे में बता पाने में असफल रहा. ऐसे में मानसून के बारे में भविष्यवाणी के नए तरीकों की खोज की जाने लगी थी. 2015 में जाकर भारतीय मौसम विभाग ने एक बिल्कुल नए सिस्टम की टेस्टिंग शुरू की. जो किसी एक चुनी हुई जगह और दिन का मौसम भी बता सकती थी. इसमें धरती और समुद्र के तापमान, नमी, हवा की गति और कई सारे अन्य कारकों का अध्ययन भी किया जाने लगा था. इस काम के लिए मौसम विभाग ने शक्तिशाली कंम्प्यूटर्स का इस्तेमाल किया था.
हालांकि मौसम विभाग ने ऐसे बहुत से नए-नए तरीके अपनाए हैं लेकिन मानसून का सही अनुमान लगाना आज भी मुश्किल बात बुनी हुई है. क्योंकि 10 से 15 दिनों पहले की गई भविष्यवाणी भी किसी एक कारक के तेजी से बदलने के चलते गलत साबित हो जाती है. ऐसे में आज भी पहले वाला IMD का स्टैटिस्टिकल मॉडल ही आज भी मौसम की भविष्यवाणियों का आधार बना हुआ है. हालांकि माना जा रहा है कि इसके गिने-चुने दिन ही बचे हैं. हां भी और नहीं भी.
जानकारों के मुताबिक भारत में पानी की समस्या, भूजल संसाधनों के ज्यादा दोहन का नतीजा है. इसके अलावा इसका कारण बारिश के पानी और धरती के ऊपर के जल का सही से संरक्षण न किया जाना है. ऐसे में भले ही जुलाई में होने वाली बारिश सूखे इलाकों को तर कर दे लेकिन यह शायद ही बड़े स्तर पर भूजल की समस्या के लिए कुछ भी नहीं कर सकता है.

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