इंदौर पीडब्ल्यूडी मंत्री गोपाल भार्गव ने मंगलवार को बंगाली चौराहा ब्रिज के बचे हिस्से की डिजाइन बदलने पर सहमति जताई है। विधायक महेंद्र हार्डिया से मुलाकात में उन्होंने बुधवार को ही अफसरों को बुलाकर डिजाइन डिफेक्ट दूर करने की बात कही है।
भास्कर एक्सपर्ट के जरिये दो विकल्प रख रहा है। इस बार यह इसलिए जरूरी है क्योंकि पिछली बार ध्यान नहीं देने के कारण ब्रिज पर 6 महीने और 8 करोड़ रुपए बर्बाद होने जा रहे हैं। मौजूदा डिजाइन में ब्रिज बनाया तो 120 कॉलोनियों की दो लाख आबादी और रिंग रोड से रोज गुजरने वाले 2 लाख वाहन चालक हमेशा परेशान होते रहेंगे। यहां पिलर खड़े किए जाने से अंधा मोड़ बन जाएगा, जिससे रोज हादसे होंगे। इतना ही नहीं ब्रिज भी अधिकतम पांच साल ही ट्रैफिक लोड सह पाएगा। ब्रिज की खामियों पर रिपोर्ट पढ़ें|
डिजाइन बदलने में ऐसे 8 करोड़ लागत बढ़ेगी
स्पॉन डबल हो रहा है तो कॉस्ट 4 करोड़ और लोहे के गर्डर पर 2 करोड़ खर्च होंगे। यदि बीच का पिलर हटाया तो बाकी पिलर की स्ट्रेंथनिंग पर भी एक से डेढ़ करोड़ लगेंगे।
- पिलर 30 मीटर की दूरी पर बने हैं। नीचे से वाहन निकलने 100 फीट राेड है। बंगाली में पिलर के बीच 15 मीटर ही जगह है।
- पिलर को राउंड शेप में बनाया है, बंगाली में ये बड़े साइज में बने हैं, जो जगह ज्यादा घेर रहे। पेयर कैप बड़ी है, बंगाली में छोटी है।
- बोगदों के नीचे 100-100 फीट जगह होने से 1.75 लाख वाहनों की आवाजाही आसानी से हो रही, बंगाली में आधी जगह ही मिलेगी।
- ब्रिज की दोनों या तीनों भुजाएं कांक्रीट से बनती हैं। मध्य भाग आर्च जैसा बनने से जगह कम लगती है और जल्दी भी तैयार होता है।
- आरसीसी की तुलना में ये ब्रिज हलके होते हैं। वाहनों का वजन व मटेरियल का वजन कॉन्क्रीट ब्रिज की तुलना में 40% कम होता है।
- काॅन्क्रीट का मध्य भाग बनने में यदि 8 करोड़ लागत आती है तो आर्च वाले स्ट्रक्टर में सिर्फ 10 से 20% अधिक लागत आती है।

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