शिवपुरी (पोहरी): देश में एक तरफ जहाँ किसान को ‘अन्नदाता’ कहकर सम्मानित करने का दावा किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर उसे अपनी बुनियादी ज़रूरतों—जैसे खाद और बीज—के लिए सड़कों पर लाठियाँ खाने और चक्काजाम करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। ताज़ा मामला शिवपुरी ज़िले के पोहरी क्षेत्र का है, जहाँ खाद की किल्लत और वितरण व्यवस्था की बदहाली से तंग आकर किसानों का गुस्सा फूट पड़ा।
सोमवार सुबह टोकन न मिलने और कई दिनों से खाद वितरण केंद्र के चक्कर काटकर हताश हो चुके किसानों ने आईटीआई (ITI) के पास शिवपुरी-श्योपुर हाईवे पर चक्काजाम कर दिया। करीब एक घंटे तक चले इस विरोध प्रदर्शन के कारण हाईवे के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और आवागमन पूरी तरह ठप्प रहा।
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यह घटना केवल एक दिन का गुस्सा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का नतीजा है:
- कुप्रबंधन और अव्यवस्था: किसानों का आरोप है कि वे पिछले कई दिनों से खाद के लिए कतारों में खड़े हो रहे हैं, लेकिन न तो ऑनलाइन/ऑफलाइन टोकन बुक हो रहे हैं और न ही वितरण प्रणाली पारदर्शी है।
- अधिकारियों का ढुलमुल रवैया: घंटों लाइन में लगने के बाद किसानों को खाली हाथ लौटना पड़ता है। प्रशासनिक योजना और दूरदर्शिता के अभाव में यह स्थिति हर साल दोहराई जा रही है।
- आश्वासन का खेल: मौके पर पहुंचे पोहरी थाना प्रभारी रवि चौहान और पुलिस बल ने किसानों को समझा-बुझाकर और दोपहर की बैठक के बाद व्यवस्था सुधारने का आश्वासन देकर जाम तो खुलवा दिया, लेकिन सवाल यह उठता है कि संकट पैदा होने से पहले प्रशासन नींद से क्यों नहीं जागता?
संपादकीय दृष्टिकोण: आखिर कब सुधरेगी व्यवस्था?
"जब बुवाई का समय होता है, तब किसान खेतों में पसीना बहाने के बजाय खाद के टोकन के लिए सड़कों पर लाचार खड़ा नजर आता है। यह केवल खाद की कमी नहीं, बल्कि प्रशासनिक दूरदर्शिता और नियत की कमी को दर्शाता है।"
अगर समय पर किसानों को खाद और बीज उपलब्ध नहीं कराए गए, तो इसका सीधा असर फसल की उपज और किसान की आजीविका पर पड़ेगा। प्रशासन को महज़ 'आश्वासन' देने के बजाय वितरण केंद्रों पर टोकन बुकिंग और सप्लाई की प्रक्रिया में पारदर्शिता लानी होगी।
किसानों ने साफ़ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही खाद की सुचारू उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है। अब देखना यह है कि शासन-प्रशासन इस चेतावनी से सबक लेता है या फिर किसानों को दोबारा सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

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