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जब आबकारी विभाग सोया कुंभकर्णी नींद, तो लट्ठ लेकर खुद उतरीं महिलाएं: शिवपुरी में अवैध शराब के अड्डों पर नारी शक्ति का 'तांडव'

 


शिवपुरी। ज़िले में फल-फूल रहे अवैध शराब के काले कारोबार पर जब ज़िम्मेदार आबकारी विभाग और प्रशासन ने पूरी तरह आँखें मूँद लीं, तो आखिरकार नारियों को ही 'चंडी' का रूप धारण करना पड़ा। हमारे संस्थान द्वारा शिवपुरी ज़िले में अवैध शराब के फलते-फूलते साम्राज्य पर बार-बार प्रमुखता से खबरें प्रकाशित कर प्रशासन को चेताया गया, लेकिन आबकारी विभाग के कान पर जूँ तक नहीं रेंगी। जब अफसरों की मुस्तैदी सिफ़र साबित हुई, तब तंग आकर महिलाओं को खुद हाथों में लाठियाँ उठानी पड़ीं।

दविया कलां में भारी बवाल: सड़क पर बहाई अवैध शराब

ताज़ा मामला पिछोर अनुविभाग क्षेत्र के दविया कलां गाँव का है, जहाँ सोमवार को आदिवासी महिलाओं का आक्रोश फूट पड़ा। हाथों में लाठियाँ और डंडे थामे सैकड़ों महिलाओं ने गाँव में संचालित अवैध शराब के अड्डों पर अचानक धावा बोल दिया।

  • उखाड़ फेंके ठिकाने: महिलाओं ने मौके पर मौजूद कच्ची और अवैध देशी शराब के कुप्पों व बर्तनों को कब्जे में लिया और बीच सड़क पर उड़ेलकर नष्ट कर दिया।
  • सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल: सड़क पर शराब बहाने और अवैध कारोबारियों को खदेड़ने के ये वीडियो अब सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो रहे हैं, जो आबकारी विभाग की नाकामी और सुस्ती पर करारा तमाचा हैं।

घरों की बर्बादी और बच्चों का भविष्य बचाने उतरीं नारियाँ

विरोध में उतरीं महिलाओं का साफ़ कहना है कि गाँव में लंबे समय से बेखौफ़ अवैध शराब बेची जा रही है।

"शराब की लत से घर के पुरुष बर्बादी की कगार पर हैं। आए दिन घरेलू हिंसा, मारपीट और क्लेश से घर नर्क बन चुके हैं। परिवारों पर आर्थिक संकट छाया है और बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। जब पुलिस-प्रशासन ने हमारी कोई सुनवाई नहीं की, तो हमें खुद मैदान में उतरना पड़ा।"

सहरिया समाज का कड़ा रुख: ₹5100 का जुर्माना और सीधा बहिष्कार

इस अभूतपूर्व आंदोलन के पीछे आदिवासी सहरिया समाज का सामूहिक और ऐतिहासिक फ़ैसला है।

  • 12 जुलाई की महापंचायत: आदिवासी सहरिया संगठन की बैठक में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ था कि समाज का कोई भी व्यक्ति शराब का सेवन नहीं करेगा।
  • आर्थिक दंड: यदि कोई शराब पीते पकड़ा गया, तो उस पर ₹5100 का आर्थिक दंड ठोका जाएगा।
  • कच्ची शराब पर प्रहार: समिति के सदस्यों को गाँव-गाँव जाकर अवैध भट्ठियों को ध्वस्त करने और शराब माफिया का सामाजिक बहिष्कार करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है।

आबकारी लाचार, महिलाएँ तैयार: कफ़ार के बाद अब दविया कलां में हुंकार

यह कोई पहला मौका नहीं है जब आबकारी विभाग की नाकामी को महिलाओं ने बेनकाब किया हो। इससे पहले 16 जुलाई को खनियाधाना क्षेत्र के कफ़ार गाँव में भी आदिवासी महिलाओं ने इसी तरह लाठियाँ लेकर मोर्चा खोला था। वहाँ भी महुआ, कच्ची शराब और भट्ठियों के उपकरणों को सड़क पर पटक-पटक कर नष्ट किया गया था।

यहाँ आपके समाचार के अंत के 'बड़ा सवाल' वाले हिस्से को और अधिक तीखा, हमलावर और विस्तृत (लंबा) बनाकर तैयार किया गया है:

 बड़ा सवाल: आबकारी विभाग की इस शर्मनाक ख़ामोशी के पीछे आख़िर किसकी शह?

क्या शिवपुरी में क़ानून और व्यवस्था का जनाज़ा निकल चुका है?

हमारे समाचार पत्र/चैनल ने एक ज़िम्मेदार मीडिया की भूमिका निभाते हुए शिवपुरी ज़िले के कोने-कोने में फल-फूल रहे अवैध शराब के इस काले कारोबार का कच्चा चिट्ठा बार-बार उजागर किया। हमने सबूतों के साथ आबकारी विभाग और स्थानीय प्रशासन की नींद हराम करने की कोशिश की, लेकिन अफ़सोस! नक़दी की खनक और साहबों की बेफ़िक्री के आगे हमारी चेतावनियाँ अनसुनी कर दी गईं।

अब सवाल सीधा और चुभने वाला है—

  • जब आबकारी अमले की गाड़ियाँ और चमचमाते दफ़्तर जनता के टैक्स से चल रहे हैं, तो अवैध भट्ठियों को तोड़ने का काम घर की असहाय महिलाओं को लाठियाँ उठाकर क्यों करना पड़ रहा है?
  • क्या आबकारी विभाग के अफ़सर सिर्फ़ मोटी तनख़्वाहें और कुर्सियाँ सेंकने के लिए बैठे हैं?
  • आख़िर कब तक शराब माफिया और आबकारी अधिकारियों के इस कथित 'नापाक साठगांठ' की कीमत मासूम बच्चों का भविष्य, उजड़ते सुहाग और घरेलू हिंसा से कराहती महिलाएँ चुकाती रहेंगी?

ज़िले में एक के बाद एक—पहले कफ़ार और अब दविया कलां—महिलाओं का यह रौद्र रूप इस बात का साक्षात प्रमाण है कि जनता का सब्र अब टूट चुका है। अगर आबकारी विभाग ने अपनी कुंभकर्णी नींद और संवेदनहीन रवैया तुरंत नहीं त्यागा और इन अवैध कारोबारियों पर कठोर कार्रवाई नहीं की, तो यह सुलगता जनाक्रोश आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन का रूप लेकर सीधे प्रशासन की ईंट से ईंट बजा देगा!

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