शिवपुरी (मध्य प्रदेश): शिवपुरी जिले के कोलारस थाना अंतर्गत लुकवासा चौकी क्षेत्र के उकावल गांव स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय से गुरु-शिष्य की परंपरा को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ प्यास लगने पर शिक्षक की बोतल से पानी पी लेने पर एक 8 वर्षीय बालक के साथ मारपीट की गई और उस पर जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया गया। शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी शिक्षक के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
क्या है पूरा मामला? गांव निवासी राजू जाटव ने पुलिस को दी शिकायत में बताया कि उनका 8 वर्षीय पुत्र अभि, उकावल के शासकीय प्राथमिक विद्यालय में कक्षा 4 का छात्र है। स्कूल में प्यास लगने पर अभि ने शिक्षक लोकेश शर्मा की पानी की बोतल से पानी पी लिया था। आरोप है कि इस बात से नाराज होकर शिक्षक लोकेश शर्मा ने छात्र के साथ न केवल मारपीट की, बल्कि उसके खिलाफ अमर्यादित व जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल भी किया। घटना के समय स्कूल में मौजूद अन्य छात्र रोहित जाटव और टीवाश जाटव भी इस मामले के प्रत्यक्षदर्शी हैं।
पुलिस की कार्रवाई: पीड़ित परिवार की शिकायत पर कोलारस पुलिस ने आरोपी शिक्षक लोकेश शर्मा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 296(ए), 115(2) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(द), 3(1)(ध) तथा 3(2)(व्हीए) के तहत प्रकरण दर्ज कर लिया है। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
गुरु-शिष्य संबंध और जातिवाद: मानव समाज के लिए चिंताजनक संदेश
शिक्षक को समाज में मार्गदर्शक और राष्ट्र निर्माता माना जाता है। जब शिक्षा के मंदिर (विद्यालय) में ही एक अबोध बच्चे के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव या हिंसा की जाती है, तो यह संपूर्ण मानव समाज के लिए अत्यंत घातक और शर्मनाक संदेश देता है:
- गुरु-शिष्य परंपरा का पतन: प्राचीन काल से ही भारत में गुरु-शिष्य का रिश्ता पवित्र माना गया है, जहाँ ज्ञान और स्नेह ही मुख्य आधार थे। जब एक शिक्षक ही पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता पर बच्चे में भेदभाव देखने लगे, तो इससे इस पवित्र रिश्ते की गरिमा और विश्वास को गहरा ठेस पहुँचता है।
- मासूम मन पर गहरा मानसिक आघात: 8 साल का बच्चा, जिसे अभी समाज की कुरीतियों का ज्ञान भी नहीं है, यदि ऐसे भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके मन में शिक्षा और समाज के प्रति भय और हीनभावना बैठ जाती है। इससे बच्चों का विकास अवरुद्ध होता है।
- समाज में गलत संदेश: इस तरह की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि 21वीं सदी में भी जातिवादी मानसिकता की जड़ें गहरी हैं। यह समाज में समानता, बंधुत्व और मानवता के विचारों को कमजोर करती हैं और विभाजनकारी सोच को बढ़ावा देती हैं।
- शिक्षा के उद्देश्य पर सवाल: शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति के भीतर से अज्ञानता और कुरीतियों को दूर करना है। यदि शिक्षक स्वयं ही इन कुरीतियों से ग्रस्त रहेगा, तो वह आने वाली पीढ़ी को समानता और मानवता का पाठ कैसे पढ़ा पाएगा?
एक सभ्य समाज में जाति, धर्म या लिंग के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव स्वीकार्य नहीं हो सकता, विशेषकर बच्चों के साथ। ऐसे मामलों में कठोर प्रशासनिक और कानूनी कार्यवाही ही समाज को यह संदेश दे सकती है कि कानून के सामने सभी समान हैं।

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