शराब की बलिवेदी पर फिर बलि चढ़ी एक मासूम
शिवपुरी। शराब का जहर जब किसी इंसान के सिर चढ़कर बोलता है, तो वह किस कदर हैवान बन सकता है, इसकी एक हृदय विदारक नजीर छर्च थाना क्षेत्र के श्यामपुरा गांव में देखने को मिली। गृहकलेश की उपजी सनक में एक कलयुगी पिता ने अपनी ही 6 साल की मासूम बेटी को जमीन पर पटक-पटक कर मौत के घाट उतार दिया। यह घटना न केवल समाज की चेतना पर करारा तमाचा है, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर नशा और घरेलू हिंसा का यह दौर और कितनी मासूम जिंदगियों को लीलेगा।
विवाद पत्नी से, गुस्सा मासूम पर
शनिवार रात आरोपी रामबरन आदिवासी शराब के नशे में धुत्त होकर घर पहुंचा था। शराबखोरी को लेकर जब पत्नी ने विरोध जताया, तो मामला मारपीट तक जा पहुंचा। अपनी जान बचाने के लिए पत्नी एक साल के बेटे को लेकर पड़ोसी गांव चली गई। लेकिन गुस्से से बिलबिला रहे रामबरन का हैवान रूप यहीं शांत नहीं हुआ। वह पास ही अपने भाई के घर पहुंचा, जहां उसकी 6 वर्षीय बेटी शिवानी खेल रही थी। पिता के रूप में आए 'काल' ने बिना कुछ सोचे-समझे उस बेकसूर बच्ची को उठाकर जमीन पर पटक दिया। बच्ची के सिर पर आई गंभीर चोटों ने उसकी वहीं सांसें उखाड़ दीं। श्योपुर अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
कानून ने कसा शिकंजा, पर प्रशासनिक संवेदनहीनता पर उठे सवाल
घटना के बाद हरकत में आई पुलिस ने आरोपी पिता को गिरफ्तार कर मामला दर्ज कर लिया है, जो कि एक अनिवार्य कानूनी प्रक्रिया है। लेकिन इस दुखद हादसे का दूसरा पहलू ज्यादा दुखदायी और चिंताजनक है। मासूम को खो चुके गरीब परिजनों को प्रशासनिक लालफीताशाही का शिकार होना पड़ा। परिजनों का आरोप है कि सूचना देने के बावजूद देर शाम तक पोस्टमार्टम नहीं कराया गया, और श्योपुर से शव को शिवपुरी मेडिकल कॉलेज लाने के लिए उन्हें खुद गाड़ी का इंतजाम करना पड़ा।
आर्थिक रूप से बेबस परिवार को इस भीषण त्रासदी के बीच रात मेडिकल कॉलेज परिसर में खुले आसमान के नीचे गुजारनी पड़ी।
हमारी नजर में केवल गिरफ्तारी काफी नहीं, तंत्र को भी संवेदनशील होना होगा
यह घटना दो बेहद गंभीर मुद्दों को रेखांकित करती है—पहला, ग्रामीण इलाकों में बेकाबू होती शराबखोरी जो आए दिन परिवारों को तबाह कर रही है। और दूसरा, पुलिस व स्वास्थ्य तंत्र का असंवेदनशील रवैया।
अपराधी को सख्त से सख्त सजा मिलना तय है और मिलनी भी चाहिए, ताकि समाज में एक नजीर पेश हो सके। लेकिन सवाल उन जिम्मेदार अफसरों से भी है जो एक गरीब और पीड़ित परिवार को त्रासदी के वक्त न्यूनतम मानवीय सहायता (जैसे शव वाहन या समय पर पोस्टमार्टम) तक मुहैया नहीं करा सके।
किसी मासूम की मौत पर महज 'केस दर्ज' कर लेना पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी का अंत नहीं है। जब तक पीड़ित परिवारों के प्रति व्यवस्था में संवेदनशीलता और नशे के खिलाफ जमीनी स्तर पर कठोरता नहीं आएगी, तब तक शिवानी जैसी न जाने कितनी मासूमियत इसी तरह दम तोड़ती रहेगी।

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