ख़ास मामला मर्दाना बचाव का है.
यौन उत्पीड़न के दाग़ से मुक्त होने के लिए महिला को निशाना बनाया गया और प्रताड़ित किया गया. उनकी निजता भंग की गई.
इस महीने की शुरुआत में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस पर राजभवन की एक महिला कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया. उसने अपने साथ हुए उत्पीड़न की शिकायत कोलकाता पुलिस से की.
संविधान की धारा 361 के मुताबिक राज्यपाल के उनके पद पर रहने के दौरान किसी तरह की आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती है. इसलिए इस मामले में कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है.
ख़ास मामला मर्दाना बचाव का है.
पुलिस इस शिकायत के क़ानूनी पहलूओं पर विचार कर रही है, वहीं राज्यपाल ने अपने ऊपर लगे आरोप से इनकार किया.
बचाव में उठाया गया कदम
लेकिन, इस बीच राज्यपाल के एक क़दम से और सवाल खड़े हो गए हैं. उन्होंने राजभवन में लगे सीसीटीवी कैमरे की फुटेज कुछ लोगों को दिखाई.
मीडिया रिपोर्ट्स में राजभवन के हवाले से कहा गया है कि नौ मई को राजभवन में 90 से 100 लोगों की मौजूदगी में दो मई के सीसीटीवी फुटेज दिखाए गए.
यह कवायद बचाव के लिए थी.
इस फुटेज में आरोप लगाने वाली पीड़ित महिला भी थी. लोगों को दिखाए गए फुटेज़ में उसके चेहरे को छिपाया नहीं गया था.
ज़ाहिर है, वहाँ मौजूद लोगों ने उस महिला के चेहरे को भी देखा. यानी उसकी पहचान उजागर हो गई.
महिला का कहना है कि इससे उसकी और उसके परिवार की बेइज़्ज़ती हुई.
पहचान पर इतना ज़ोर क्यों है?
इस पूरे मामले में कुछ बातें बहुत साफ़ दिखती हैं.
एक- आरोप यौन उत्पीड़न का है.
दो- यौन उत्पीड़न का आरोप जिन पर लगा है, वे संवैधानिक पद पर हैं.
तीन- आरोप लगाने वाली महिला की पहचान उजागर की गई.
चौथा- पहलू महिला को इंसाफ़ मिलने की राह की मुश्किलों से जुड़ा है.
हमारे समाज में यौन हिंसा को ख़ास नज़र से देखा जाता है. अकसर सर्वाइवर लड़की या महिला को ही कलंकित किया जाता है. यहां तक कि कई बार तो उसे ही अपराध की वजह बना दिया जाता है.
समाज में उसके बारे में ही तरह-तरह की बातें की जाती हैं. इसमें सबसे अहम बात ‘इज़्ज़त’ की होती है. यानी किसी के साथ यौन हिंसा हुई, तो उसकी ही इज़्ज़त पर बट्टा लग गया.
व्यक्ति की इज़्ज़त को समेटकर कर शरीर के कुछ अंगों तक सीमित कर दिया जाता है. उसी से इज़्ज़त और बेइज़्ज़ती का पूरा विचार रचा जाता है. यही नहीं, पहचान उजागर होने पर उसे ही प्रताड़ित किया जाता है. उसे ही ‘बुरी स्त्री’ बना दिया जाता है. लड़की या महिला का समाज में चलना दूभर हो जाता है.
कई बार उस पर मामले को रफ़ा-दफ़ा करने के लिए दबाव भी बनाया जाता है. यह सब स्त्री के साथ-साथ उसके पूरे परिवारजनों को झेलना पड़ता है. इसीलिए पहचान ज़ाहिर न करने पर इतना ज़ोर है.
इसीलिए क़ानून और ऊपरी अदालत के फैसलों में भी इसका ख़्याल रखा गया है. इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि पहचान ज़ाहिर न हो.



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