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आरटीई की 'प्रतिपूर्ति का ढोल' और जमीनी हकीकत: 502 करोड़ की फीस तो बटी, पर शिक्षा व्यवस्था के बुनियादी सवाल अब भी कायम!


भोपाल/नरसिंहपुर: मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में आयोजनों, दावों और करोड़ों रुपये के आंकड़ों की कभी कमी नहीं रही। इसी कड़ी में 11 अक्टूबर को नरसिंहपुर में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव 20 हजार 456 अशासकीय (निजी) स्कूलों को 502 करोड़ रुपये की आरटीई (RTE) फीस प्रतिपूर्ति राशि सिंगल क्लिक से जारी करेंगे। दावा है कि इससे 8 लाख 19 हजार से अधिक गरीब व वंचित वर्ग के बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा का मार्ग सुगम होगा। साथ ही, नरसिंहपुर में 45 करोड़ से अधिक की लागत से बने सर्वसुविधायुक्त 'शासकीय सांदीपनि उत्कृष्ट विद्यालय' के नए भवन का लोकार्पण भी होगा।

यकीनन, कागजी आंकड़ों और इवेंट मैनेजमेंट के लिहाज से यह एक भव्य तस्वीर पेश करता है। वर्ष 2011 से अब तक 3,600 करोड़ रुपये बांटे जाने का आंकड़ा भी सरकार की पीठ थपथपाने के लिए काफी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ निजी स्कूलों के खाते में सरकारी खजाना रीता कर देने से प्रदेश के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पा रही है?

कागजी 'पारदर्शिता' और निजी स्कूलों की मनमानी

सरकार जिस आरटीई प्रतिपूर्ति का जश्न मना रही है, उसके पीछे की कड़वी सच्चाई यह भी है कि निजी स्कूल हर साल बजट देरी से मिलने का रोना रोते हैं और अक्सर आरटीई के तहत आने वाले गरीब बच्चों के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आती हैं। वहीं दूसरी तरफ, निजी स्कूलों की बेतहाशा बढ़ती फीस, किताबों और यूनिफॉर्म के नाम पर अभिभावकों की जेब काटने की लूट पर नकेल कसने में यही तंत्र लाचार नजर आता है। क्या सरकारी खजाने से निजी स्कूलों का पेट भरना ही राज्य का अंतिम लक्ष्य बन गया है?

सांदीपनि के 'शीशमहल' बनाम जर्जर सरकारी स्कूल

नरसिंहपुर में 45 करोड़ रुपये खर्च करके डिजिटल क्लासरूम, कंप्यूटर लैब, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और ऑडिटोरियम वाला 'सांदीपनि विद्यालय' खड़ा करना सराहनीय कदम हो सकता है। माही साहू जैसी मेधावी छात्राओं की सफलता निश्चित ही इस मॉडल पर मुहर लगाती है।

लेकिन बड़ा संपादकीय सवाल यह है कि—क्या प्रदेश के बाकी हजारों सरकारी स्कूल केवल बदहाली के भरोसे रहेंगे? एक तरफ कुछ चुनिंदा 'मॉडल' या 'सांदीपनि' स्कूलों पर करोड़ों न्योछावर कर दिए जाते हैं, वहीं दूसरी तरफ दूर-दराज के गांवों में चल रहे प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूल शिक्षकों की कमी, टूटी छतों, बिना शौचालय और बिना बिजली के चलने को मजबूर हैं। क्या सरकार का काम केवल कुछ "शो-पीस" स्कूल बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से इतिश्री कर लेना है?

मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश?

निजी स्कूलों को 502 करोड़ का भुगतान करना सरकार की कोई मेहरबानी नहीं, बल्कि उनका कानूनी और संवैधानिक दायित्व है। इसे एक बड़े "उत्सव" और "उपलब्धि" के रूप में पेश करना असल में उन बुनियादी खामियों को ढकने की कोशिश लगता है, जो प्रदेश की पूरी शिक्षा प्रणाली में गहराई तक समाई हुई हैं।

जब तक प्रदेश के हर एक सरकारी स्कूल को बुनियादी सुविधाएं और योग्य शिक्षक नहीं मिल जाते, तब तक केवल "प्रतिपूर्ति" और "लोकार्पण" के कार्यक्रमों से मध्य प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की तकदीर नहीं बदलने वाली

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