पवन भार्गव एंटी करप्शन न्यूज़
शिवपुरी 26 अक्टूबर 2018
राजनीतिक गलियारे से 💐 💐 दो भाई थे एक का नाम था चापलूस औऱ दूसरे का नाम था चमचा अक्सर कर यह विरादरी अधीनस्थों और राजनीति के गलियारों में पाई जाती है एक दिन दोनो भाइयो में चर्चा हो रही थी कि अचानक एक स्वाभिमानी भाई आगया औऱ औऱ बोला तुम लोग मेरी आत्मा में समाकर देखो तो जीवन धन्य हो जाएगा और अपने आप से कहोगे मेरा भी स्वभिमान जिंदा है, चापलूस बोला हमारी आत्मा में चापलूसी ठूस ठूस कर भरी है हम तुम्हारी आत्मा में कैसे समा सकते है औऱ हमे मौका परस्ती में महारथ हासिल है जिधर दिखी दम उधर खड़े हम ,फिर चमचा बोला हम जिस भी भगोने बाल्टी में से भरना शुरू कर देते है उसको खाली करके ही दम लेते है। हमारे आकाओ के इर्द गिर्द मंडराते रहने से हमारा आका खुश रहता है पर हम पहले से ही उस्ताद है जैसे ही हमारे आका के घटते बजन को देखा वैसे ही अपना हथियार मौका परस्ती का उपयोग कर लेते है और गिरगिट की तरह रंग बदलने में समय नही लगता है। औऱ अपने आका को डूबते देखे उस पर पत्थर की सिला बांध देते है जिससे हमारे आका को डूबने में समय नही लगे। और चमचा कहने लगा में भी बाल्टी भगोने को खाली कर अपनी औकाद में आकर मोरी पर पहुच जाता हूँ, जैसे ही मेरे आका को मालूम चला चमचा ने सारी बाल्टी भगोनो को खाली कर दिया तो वह मोरी पर ही रगड़ रगड़ के मजाई करने को मजबूर हो जाता है। और ऐसा रगड़ता है मानो नया जन्म हुआ हो। चापलूस बोला मेरी भी हालत ऐसी हो जाती है मानो नाली का बदबूदार कीड़ा हूँ। फिर एक बार स्वभिमानी की मुलाकात उनके आका से हुई और उनसे पूछा आखिर आका महाराज आपको स्वभिमानी लोगो की जगह चापलूस और चमचा ज्यादा रास क्यों आते है आका ने कहा हम तो आका है हमने शुरू से ही आका गिरी की है और बचपन से ही चापलूस और चमचा हमारे इर्द गिर्द मंडराते रहे है । हमे स्वभिमानी लोगो का आदर सम्मान करने का तरीका रास नही आता जब तक वह घुटनो के बल नही मंडराता तो हम उसे अपना वफादार चापलूस नही मानते । एक दिन अपने आका के साथ चापलूसों और चमचो की फौज जंगल मे जा रही थी तभी अपने आका का स्वभिमानी साथी भी वही से गुजर रहा था तभी तीनो अपने आका के पास खड़े हो गए। औऱ स्वभिमानी ने अपने साथ जो घटना हुई उसको अपने आका को बताया राजा साहब मेरे से गलती हो गई एक गाय को भगा रहा था वह गड्ढे।में गिर गई उसकी मौत हो गई । तो राजा साहब ने अपने चापलूस और चमचो से पूछा इसको क्या सजा देना चाहिए तो चमचो ने कहा बलि के बदले इसकी भी बलि देना चाहिए। राजा समझदार था सोचा साथी तो अपना ही है इतनी बड़ी सजा नही इसको छोटी सजा देते हुये स्वभिमानी का एक पैर का अंगूठा काटने का आदेश दिया। अंगूठा काटते वक्त राजा के मुँह के पास कुछ खून की बूंदे उचट कर जम गई थी वह किसी को पता नही चला। स्वभिमानी ने राजा का अहसान माना और कहा राजा साहब आपने मुझे जीवन दान देकर मुझपर बहुत बड़ा ऐहसान किया है। में धन्य हो गया। और तीनों अपने आका राजा के साथ घनघोर जंगल की ओर निकल पड़े। वीरान जंगल मे काफी रात हो चुकी थी के अंदर जाते ही बड़े बड़े राक्षस पिसाच सामने आगये उन्होनें चारो को देखकर बोला आज तो चारो की बलि का आनन्द लेंगे , जैसे ही चापलूस और चमचो ने यह बात सुनी तो सबसे पहले राक्षसों से बोले हमे बहुत आ रही है पखाना जाना है फिर हम सबसे पहले हमारी बलि देंगे। राक्षस ओर पिशाचो ने कहा जरूर तुम्हारी अंतिम इच्छा पूरी करेंगे। और चापलूस और चमचा निकलगये औऱ वही से रफू चक्कर हो गए राक्षस उनके पीछे पड़ते तब तक बहुत दूर निकल चुके थे। फिर उन्होंने सबसे पहले राजा की बलि के लिए कहा तो स्वभिमानी बोला राक्षसों से साहब मेरी बलि लेलो पहले उन्होंने कहा नही इस राजा की ही बलि पहले लेंगे फिर तेरी। राजा ने कहा ठीक है साहब लेलो।मेरी बलि क्या करे और कोई रास्ता भी नही था। राक्षसों और पिशाचो ने अपने सौनिकों से कहा ले जाओ इसे नहा धुलाकर लाओ देख लेना गलती से नापाक न हो पाक होना चाहिए। जब राजा को नहलाने ले जा रहे तो उसके मुह के पास खून की बूंदें जमी हुई थी जो स्वभिमानी के अंगूठा काटते समय राजा के मुँह के पास जमा हो गई थी। राक्षसों औऱ पिशाचो के सौनिकों ने कहा साहब ये तो नापाक है इस्की बलि हम नही ले सकते । तब स्वभिमानी बोला मेने पहले ही कहा था मेरी बलि ले लो। उन्होंने कहा आजा बेटा तेरी ही बारी है। जब स्वभिमानी को बलि देने से पहले की रश्म पूरी करने के।लिए नहलाने ले जा रहे थे तो उसका अंगूठा पहले से ही कटा हुआ था । तो उसकी भी बलि नही ली और दोनों को भगा दिया। तब आका राजा ने कहा स्वभिमानी अगर तुम नही होते तो मेरी बलि जरूर लग जाती। में अपने चापलूसों औऱ चमचो पर बहुत विश्वास कर रहा था। राजा का भरम दूर हुआ और अपने राजपाठ धन दौलत का आधा हिस्सा स्वभिमानी के नाम करने का ऐलान किया। इस कहानी से प्रेरणा लेकर राजा आकाओ को अपने चमचो औऱ चापलूसों में से स्वभिमानी लोगो को पहचानना चाहिए।
पवन भार्गव
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