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पवन भार्गव शिवपुरी राजनैतिक हलचल नेताजी का अखाड़ा


    
                     पवन भार्गव      ,       चुनावी जुमला

इस चुनावी दौर में यहां बड़े नायाब नजारे देखने को मिल रहे हैं। टिकट की कतार में लगे पुराने मठाधीश खुद के अलावा किसी अन्य पार्टी कार्यकर्ता का तो नाम तक नहीं ले रहे इनसे  विकल्प पूछिए तो इनके पास अपनी संतान या अपने भाई का एकमेव नाम जुबान पर है फिर प्रमुख दल परिवारवाद के खिलाफ बड़े बड़े दावे करते हैं।  कोलारस, करैरा, पोहरी में ये परिवारवाद कुछ ज्यादा ही जोर मार रहा है। नेता धृतराष्ट्र हुए जा रहे हैं। 

स्वांग कर नाम चमकाने की जुगत -

चुनावी ढोल पिटना शुरु हो गया है नेताओं की  हालत पतली हुई जा रही है सभी सशंकित हैं कोई टिकट को लेकर आश्वस्त है तो जीत पर संशय है कोई जीत के दावे कर रहा है तो टिकट को लेकर माथे पर सलबटें नजर आ रही हैं।
इस दौर में कुछ नेता अपनी फील्ड चमकाने के लिए नवरात्रों में चुनरी यात्रा को ढाल बना रहे हैं तो कुछ भण्डारों और माता की आरती में बिना किसी आंमत्रण की परवाह किए अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। अब साहब जनता का काम किया होता तो ये तमाम स्वांग करने की जरुरत ही क्या थी।

टिकट की विकट टेंशन के मारे ये बेचारे -
सजातीय नेताओं ने पोहरी वाले नेताजी की नींद उड़ा रखी है वे समाज के  बूते वे जहां खुद दावेदारी कर रहे हैं वहीं उनकी भतीजी साहिबा भी अपना दम दिखाने से पीछे नहीं जबकि नेताजी तीसरी पारी की फिराक में हैं। इनके खुद के भतीजे भी विपक्ष के प्रबल दावेदारों मेंं से हैं ले दे कर उन्हें अपनों से ही जबर्दस्त टिकट टेंशन का विकट सामना करना पड़ रहा है। इनकी हालत पर देशी कहावत याद आती है देवी दिन काटे पण्डा परिचय मांगे।  
सम्बंधों पर मरहम की शुरुआत -
चुनाव है जनाब जो अच्छे अच्छों को बदल डालता है, अब देखिए कहां तो रघुवंश वालों को बहिन जी से कोई तबज्जोह नहीं मिलती थी मगर उस समय अचम्भा हुआ जब परिणय वाटिका में बहिनजी ने खुद रघुवंश वाले नेताजी का स्वास्थ्य पूछ डाला और बड़े ही आत्मीय लहजे में उनसे वार्ता कर डाली। नेताजी उस दिन से कितने नार्मल हुए ये तो वे जाने मगर बहिनजी ने ऐसा करके एक शुरुआत तो कर ही दी, अब आगे देखिए क्या होता है। दरअसल चुनाव हारे हैं तो क्या हुआ उन पर इतना साजो सामान तो है ही जिसके जरिए वे चुनावी खुरपेंच में सक्षम हैं इसलिए बेवजह की टकराहट से बेहतर है सम्बंधों में सुधार ताकि वक्त जरुरत काम आए। 
बड़े दलबदल की तैयारी -
करैरा, कोलारस और पोहरी में बड़े दलबदल की पूरी तैयारी है कारण है कुछ नेताओं के नाम पर कैचीं फिरने की आशंका। दरअसल अभी नहीं तो कभी नहीं की तर्ज पर ये नेता यह मान चुके हैं कि बाहर से कोरे जयकारों और आश्वसनों की पुडिय़ा से कुछ नहीं होना जाना इसलिए अब तमाशा घुस कर ही देखा जाए तो ही काम चलेगा इसके लिए दो तरफा बात चल रही है। कोई अपने पुत्र के जरिए तो कोई खुद ही सीधे मैदान में उतर कर चुनौती का शंख फूंकने की तैयारी में है। इस चुनाव में ऐसे ऐसे भ्रम टूटेंगे कि आप दांतों तले ऊंगलियां दबाने पर मजबूर हो जाएगें। अब आप कहेंगे नाम बताईए तो रुकिए भी जाइए जनाब बस तेल देखिए और तेल की धार देखते जाइए तमाशा सामने ही होगा।
एकीकरण का उल्टा गणित

जिले का एक विधानसभा क्षेत्र इन दिनों लुधियाना हुआ जा रहा है जिस प्रकार यहाँ की आमसभाओं में समुदाय विशेष के लोगों का एकीकरण नजर आ रहा है उसे देखते हुए टिकट भी इसी समुदाय के खाते में दिखाई दे रहा है लेकिन अपने राम का कहना यह है कि टिकट जीत की गारंटी नहीं होता क्योंकि अन्य समाज यदि लामबंद हुए तो भांवरे पड़ते देर नहीं लगनी।
जब मंच पर सजी राजमाता की तस्वीर

अमित शाह के मंच पर राजमाता के चित्र से भले ही एलानिया परहेज किया गया हो मगर सीएम की जनआशीर्वाद सभा के मंच पर राजमाता की तस्वीर सजाई गई। अब इसे वोटों का श्रृद्धाभाव कहें तो फिर अमित शाह के सभा मंच पर जो कुछ हुआ उसे क्या कहा जाए

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