जवानों को शहीद का ही दर्जा दे दो सरकार
श्रीगोपाल गुप्ता
गत दिनों काश्मीर के पुलवामा जिले के अंवतीपोरा गांव हाईवे पर पड़ौसी देश पाकिस्तान की शह पर फिदायीन हमले में मारे गये केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल 40 जवानों को लेकर पूरा देश स्तब्ध, शोक और आक्रोश में है। हालांकि भारत की सरकार और विपक्ष ने एक स्वर में इस की कड़े शब्दों में निंदा करते हुये पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी है। मगर इन चेतावनियों पर नापाकिस्तान पर कोई असर नहीं हो रहा है, क्योंकि गत 14 फरवरी के बाद भी उसके एक दिन बाद हमारी सेना का एक मेजर और अब आज रात्री में आंतकवादियों से मुठभेड़ में मेजर सहित चार जवान शहीद हो गये। बावजूद इसके हमारी सरकार चेतावनी देने में पीछे नहीं हट रही है। ये अलग विषय है कि पहले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जवानों को सलामी देते हुये कड़ी निंदा और चेतावनी दे रहे थे और अब देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित अपनी चुनावी आमसभाओं के माध्यम से दे रहे हैं। मगर कभी न सुधरने पर आमादा ना-पाकिस्तान वार पर करता आ रहा है। इस बीच सरकार ने दो मुख्य बड़े काम किये हैं, पहला पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा प्राप्त ओहदे को वापिस ले लिया है और आस्तीन में पल रहे घाटी के इन टुच्चे गुण्डे अलगावादियों से भारतीय टेक्स पैय्यरों के करोड़ों रुपयों प्रति वर्ष खर्च करने की सौगातों को वापिस ले लिया है। जो उन दहशत गर्तों से पहले ले लेना चाहिए था। आज पूरा देश जवानों की शहादत से स्तब्ध,आक्रोशित है और भारी गुस्से में है, जिसका सबूत है कि गांव से महानगरों तक पूरा भारत पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है। धरना-प्रदर्शनों और कैंडल मार्चों का सिलसिला थम नहीं रहा है ,प्रत्येक भारतीय जवानों को शहीद कर कहकर और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सम्मान देने में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। मगर दुःखद है कि पिछले कुछ वर्षों में मायोवादीयों और आंतकवादियों को कड़ी टक्कर देकर उनके खात्मा के लिए सबसे ज्यादा अपने जवानों को गंवाने वाला केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल अपने जवानों को कागजातों में शहीद का दर्जा दिलवाने में अब भी नाकाम है,क्योंकि भारत सरकार के नियमों के केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल और अन्य पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों की शहादत पर शहीद का दर्जा देने की कोई परिभाषा परिभाषित नहीं है।
9 साल पहले 6अप्रैल 2010 में देश के बीचों-बीच छत्तिसगढ़ के बस्तर जिले में जगदलपुर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर सुकमा के घौर जंगलों में माओवादियों से टक्कर लेते हुये केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों ने शहादत दी थी। इतना ही नहीं 2010 में अप्रैल से लेकर जून तक 100 जवान नक्सलियों के साथ लोहा लेते हुये वीरगति को प्राप्त हो गये थे,मगर सरकार न तब और न अब पुलवामा में शहीद हुये भारत माता के 40 लालों को शहीद मान रही है। सरकार केवल सेना के जवानों की शहादत को ही शहीद मानती है जबकि केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों की शहादत को शहीद मानने से इंकार करती है।14 मार्च 2017 को लोकसभा में एक जवाब में केन्द्रीय ग्रह राज्यमंत्री रिजिजू ने ये साफ कर दिया था कि किसी कार्यवाई या आभियान में मारे गये केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम रायफल्स के कर्मिकों के सन्दर्भ में शहीद शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है। हालांकि केन्द्रीय ग्रह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुये कहा कि ऐसा कैसा हो सकता है? जब हम अपने भाषणों में उनको शहीद कहते हैं तो वे कागजों में भी शहीद होंगे। मैं इसको दिखवाता हूं और शिघ्र उन्हें कागजातों में भी शहीद का दर्जा मिलेगा, मगर उनके बयानों को कि दिखवाता हूं को दो साल बीत गये मगर मामला फिर भी वहीं का वहीं अटका हुआ है। हालांकि मामला माननीय उच्चतम न्यायालय में भी बिचाराधीन है मगर वहां भी सरकार एक हलफनामा दायर कर कह चुकी है कि आखिर अर्धसैनिक बलों को हम शहीद का दर्जा कैसे दे सकते हैं? क्योंकि हमारे पास शहीद का दर्जा देने की कोई परिभाषा ही नहीं है। आंतकी हमले में नृशंस तरीके से केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जाबांज जवानों के मारे जाने से शोक ग्रस्त पूरे राष्ट्र ने प्रत्यक्ष या फिर टीवी चैनलों के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, ग्रहमंत्री राजनाथ सिंह सहित विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित तमाम विपक्षी नेताओं को देखा है। जिस भारी दर्द और भरे मन से उन्होने जवानों की शहादत को नमन् करते हुये दुख व्यक्त किया था, उसमें सीआरपीएफ के जवानों को शहीद घोषित करने में दिक्कत क्या है? अतः देश अपनी सरकार से पुरजोर तरीके से यह मांग करता है कि इन जवानों की शहादत को केवल भाषणों में ही नहीं वास्तविक रुप शहीदी करार दिया जाये। अन्य जरुरी कदमों के साथ यह कदम भी जरुरी है क्योंकि शहीद घोषित
श्रीगोपाल गुप्ता
गत दिनों काश्मीर के पुलवामा जिले के अंवतीपोरा गांव हाईवे पर पड़ौसी देश पाकिस्तान की शह पर फिदायीन हमले में मारे गये केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल 40 जवानों को लेकर पूरा देश स्तब्ध, शोक और आक्रोश में है। हालांकि भारत की सरकार और विपक्ष ने एक स्वर में इस की कड़े शब्दों में निंदा करते हुये पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी दी है। मगर इन चेतावनियों पर नापाकिस्तान पर कोई असर नहीं हो रहा है, क्योंकि गत 14 फरवरी के बाद भी उसके एक दिन बाद हमारी सेना का एक मेजर और अब आज रात्री में आंतकवादियों से मुठभेड़ में मेजर सहित चार जवान शहीद हो गये। बावजूद इसके हमारी सरकार चेतावनी देने में पीछे नहीं हट रही है। ये अलग विषय है कि पहले हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जवानों को सलामी देते हुये कड़ी निंदा और चेतावनी दे रहे थे और अब देश के विभिन्न हिस्सों में आयोजित अपनी चुनावी आमसभाओं के माध्यम से दे रहे हैं। मगर कभी न सुधरने पर आमादा ना-पाकिस्तान वार पर करता आ रहा है। इस बीच सरकार ने दो मुख्य बड़े काम किये हैं, पहला पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा प्राप्त ओहदे को वापिस ले लिया है और आस्तीन में पल रहे घाटी के इन टुच्चे गुण्डे अलगावादियों से भारतीय टेक्स पैय्यरों के करोड़ों रुपयों प्रति वर्ष खर्च करने की सौगातों को वापिस ले लिया है। जो उन दहशत गर्तों से पहले ले लेना चाहिए था। आज पूरा देश जवानों की शहादत से स्तब्ध,आक्रोशित है और भारी गुस्से में है, जिसका सबूत है कि गांव से महानगरों तक पूरा भारत पाकिस्तान के खिलाफ सड़कों पर उतर आया है। धरना-प्रदर्शनों और कैंडल मार्चों का सिलसिला थम नहीं रहा है ,प्रत्येक भारतीय जवानों को शहीद कर कहकर और उन्हें ज्यादा से ज्यादा सम्मान देने में अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा है। मगर दुःखद है कि पिछले कुछ वर्षों में मायोवादीयों और आंतकवादियों को कड़ी टक्कर देकर उनके खात्मा के लिए सबसे ज्यादा अपने जवानों को गंवाने वाला केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल अपने जवानों को कागजातों में शहीद का दर्जा दिलवाने में अब भी नाकाम है,क्योंकि भारत सरकार के नियमों के केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल और अन्य पैरामिलिट्री फोर्स के जवानों की शहादत पर शहीद का दर्जा देने की कोई परिभाषा परिभाषित नहीं है।
9 साल पहले 6अप्रैल 2010 में देश के बीचों-बीच छत्तिसगढ़ के बस्तर जिले में जगदलपुर से डेढ़ सौ किलोमीटर दूर सुकमा के घौर जंगलों में माओवादियों से टक्कर लेते हुये केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों ने शहादत दी थी। इतना ही नहीं 2010 में अप्रैल से लेकर जून तक 100 जवान नक्सलियों के साथ लोहा लेते हुये वीरगति को प्राप्त हो गये थे,मगर सरकार न तब और न अब पुलवामा में शहीद हुये भारत माता के 40 लालों को शहीद मान रही है। सरकार केवल सेना के जवानों की शहादत को ही शहीद मानती है जबकि केन्द्रीय अर्धसैनिक बलों के जवानों की शहादत को शहीद मानने से इंकार करती है।14 मार्च 2017 को लोकसभा में एक जवाब में केन्द्रीय ग्रह राज्यमंत्री रिजिजू ने ये साफ कर दिया था कि किसी कार्यवाई या आभियान में मारे गये केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों और असम रायफल्स के कर्मिकों के सन्दर्भ में शहीद शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता है। हालांकि केन्द्रीय ग्रह राज्यमंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने इस पर आश्चर्य व्यक्त करते हुये कहा कि ऐसा कैसा हो सकता है? जब हम अपने भाषणों में उनको शहीद कहते हैं तो वे कागजों में भी शहीद होंगे। मैं इसको दिखवाता हूं और शिघ्र उन्हें कागजातों में भी शहीद का दर्जा मिलेगा, मगर उनके बयानों को कि दिखवाता हूं को दो साल बीत गये मगर मामला फिर भी वहीं का वहीं अटका हुआ है। हालांकि मामला माननीय उच्चतम न्यायालय में भी बिचाराधीन है मगर वहां भी सरकार एक हलफनामा दायर कर कह चुकी है कि आखिर अर्धसैनिक बलों को हम शहीद का दर्जा कैसे दे सकते हैं? क्योंकि हमारे पास शहीद का दर्जा देने की कोई परिभाषा ही नहीं है। आंतकी हमले में नृशंस तरीके से केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जाबांज जवानों के मारे जाने से शोक ग्रस्त पूरे राष्ट्र ने प्रत्यक्ष या फिर टीवी चैनलों के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, ग्रहमंत्री राजनाथ सिंह सहित विपक्ष के नेता राहुल गांधी सहित तमाम विपक्षी नेताओं को देखा है। जिस भारी दर्द और भरे मन से उन्होने जवानों की शहादत को नमन् करते हुये दुख व्यक्त किया था, उसमें सीआरपीएफ के जवानों को शहीद घोषित करने में दिक्कत क्या है? अतः देश अपनी सरकार से पुरजोर तरीके से यह मांग करता है कि इन जवानों की शहादत को केवल भाषणों में ही नहीं वास्तविक रुप शहीदी करार दिया जाये। अन्य जरुरी कदमों के साथ यह कदम भी जरुरी है क्योंकि शहीद घोषित

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