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राम लला अब हम चार माह बाद आयेंगे और मंदिर

7 फरवरी 2019
राम लला अब हम चार माह बाद आयेंगे और मंदिर

सन् 1984 से प्रत्येक आम चुनाव और दीगर चुनावों में अयोध्या में राम जन्मभूमी पर भगवान राम का भव्य मंदिर बनाने को चुनावी मुद्दा बनाने वाली विश्व हिंदू परिषद अब आम चुनाव 2019  को देखते हुये चार महीने खामोश रहेगी। इसके पीछे पहली दफा अपने स्टेंट से पीछे हटते हुये उसका कहना है कि वो नहीं चाहती कि आम चुनाव में राम मंदिर कोई चुनावी मुद्दा बने। देश और दुनिया के करोड़ों भगवान राम के भक्तों के लिए यह बहुत अचरज की बात है कि राम मंदिर के निमार्ण को लेकर झांसे में आये भगवान राम को प्रत्येक चुनाव में 'राम लला हम आयेंगे और मंदिर वहीं बनायेंगे' कहने वाले विश्व हिंदू परिषद, आर आर एस और भाजपा के लोग अब कह रहे हैं कि 'राम लला अब हम चार माह बाद आयेंगे और मंदिर वहीं बनायेंगे'? आखिर इस बदलाव की वजह क्या है? जबकि उत्तराखंड के देहरादून में अपने चार दिवसिय प्रवास पर पहुंचे राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सुप्रीमों मोहन भागवत ने आज भी कहा कि अगले आम चुनाव 2019 में राम मंदिर एक बड़ा मुद्दा बनेगा। अचानक राम मंदिर को बनाने का सपना देश की जनता को विगत चार दशक से दिखाने वाले आरआरएस प्रमुख और उनके अनुवांशिक संगठन विश्व हिंदू परिषद जिस पर राम मंदिर बनाने की जिम्बेदारी है, के अंतरराष्ट्रीय महासचिव सुरेन्द्र जैन के विरोधा भाषी बयानों की वजह क्या है?जैन का कहना है कि हमने चार महीने के लिए अयोध्या में भगवान राम की जन्मस्थली पर अपना निर्माण अभियान रोकने का फैसला लिया है, अब नई के आने बाद ही कार्यवाही शुरु की जावेगी। जबकि देश और दुनिया दोनों जानते हैं कि हिंदुस्तान के तख्त पर आज भारतीय जनता पार्टी काबिज है तो उस में राम मंदिर का बहुत बड़ा योगदान है। सन् 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुये चुनाव में संसद में केवल दो सीटों पर सिमटी भाजपा राम मंदिर -राम मंदिर जप कर ही आज सत्ता तक पहुंची है। जानकारों के अनुसार इस दफा विश्व हिंदू परिषद का राम मंदिर को चुनावी मुद्दा न बनाने की अहम वजह शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती की वो धर्म संसद है जो उन्होने प्रयागराज में चल रहे कुंभ में गत 29-30 जनवरी को आयोजित कर डाली। शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती की धर्म संसद में यह निर्णय लिया गया कि अगामी 21 फरवरी को शंकराचार्य स्वरुपानंद सरस्वती के नेतृत्व में संत समाज अयोध्या कूच करेंगे और वे मंदिर का शिलान्यास राम जन्मस्थली पर पर करेंगे। इसके साथ ही शंकराचार्य जी ने सरकार को चेतावनी दे दी है कि अगर शिलान्यास से रोका और गोली चली तो सबसे पहले उनकी छाती पर गोली लगेगी, क्योंकि वे सबसे आगे होंगे। इसके दूसरे दिन ही  31 जनवरी को विश्व हिंदू परिषद ने भी कुंभ में धर्म संसद का आयोजन किया, जिसमें मोहन भागवत भी शामिल हुये। चूकि प्रधानमंत्री मोदी ने गत एक जनवरी को ही अपने एक साक्षात्कार में साफ कर दिया कि जब तक राम जन्मभूमी का मुद्दा कोर्ट में है तब तक मंदिर बनाने के लिए वे कोई कार्यवाही नहीं करेंगे। इस धर्म संसद में विश्व हिंदू परिषद को झटका तब लगा जब मंदिर मुद्दे की लड़ाई लड़ने वाला और उसके कदम से कदम चलाने वाले अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद का कोई प्रतिनिधी नहीं पहुंचा। धर्म संसद का हाल-बेहाल और राम मंदिर मुद्दा लेकर उड़े कांग्रेस समर्थक शंकराचार्य स्वामी स्वरुपानंद सरस्वती के कारण ही पिछले तीन दशक में पहली मर्तबा विश्व हिंदू परिषद को अपने पैर पीछे खींचने पड़े, अन्यथा राजनीतिक पंडितों के अनुसार राम मंदिर व आरआरएस,विश्व हिंदू परिषद और भाजपा तो एक दूसरे के लिये ही बने हैं। बहरहाल यह भाजपा के लिये झटका ही है।

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