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सीवर प्रोजेक्ट घोटालाः शिवपुरी में 1.12 करोड़ के फर्जी भुगतान के लिए पीएचई के ईई सहित 5 पर एफआइआर


 शिवपुरी।

शहर की जनता के लिए सफेद हाथी बन चुके झील सरंक्षण परियोजना (सीवर प्रोजेक्ट) में अब नया घोटाला सामने आया है। लोक यांत्रिकी स्वास्थ्य विभाग (पीएचई) के अधिकारियों ने सीवर प्रोजेक्ट की ठेकेदार कंपनी को फायदा पहुंचाते हुए फर्जी तरीके से 1.12 करोड़ रुपये का भुगतान कर शासन को क्षति कारित की है। मामला 2018 में किए गए भुगतान का है। इस घोटाले में लोकायुक्त ने पीएचई के कार्यपालन यंत्री एसएल बाथम, तत्कालीन सहायक यंत्री केजी सक्सेना, उपयंत्री एमडी गौड़, उपयंत्री डीपी सिंह और ग्वालियर की ठेकेदार कंपनी मैसर्स जैन एंड राय कंपनी पर एफआइआर दर्ज की है। लोकायुक्त ने इन सभी अधिकारियों पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, आइपीसी की धारा 120बी, 420, 467, 468 और 471 में मामला दर्ज किया है। लोकायुक्त में जांच में प्रथम दृष्टया इन सभी आरोपों को प्रमाणित पाया है और सभी संबंधित सक्षम अधिकारियों को कार्रवाई के लिए पत्र लिखा है।

शक्तिपुरम खुड़ा निवासी अशफाक खान ने शिकायत की थी कि सीजर प्रोजेक्ट की डीपीआर में क्रियान्वयर एजेंसी द्वारा नगर पालिका की सड़कों को सीवर लाइन बिछाने के लिए खोदा जाना था। इसके बाद लाइन बिछाकर उसका भराव कर, काम्पेक्शन कर डब्ल्यूबीएम रोड़ डालकर नगर पालिका को पुनः वापस करना था। नपा को इन पर सीसी रोड डालना था। पीएचई के अधिकारियों ने क्रियान्वयन एजेंसी के साथ मिलीभगत और भ्रष्टाचार से न ही काम्पेक्शन और समतलीकरण किया और न ही 47 डब्ल्यूबीएम रोड का निर्माण किया। इसके बिना ही सड़कें नपा को हैंडओवर कर दी गईं। इनमें से 30 सड़कों का भौतिक सत्यापन भी कर लिया गया है जबकि 17 सड़कों पर सीसी रोड डाले जाने की वजह से उनका सत्यापन नहीं हो पाया है। जांच के दौरान लोकायुक्त की विशेष पुलिस थाना बल ने वहां रहने वाले लोगों के बयान भी लिए हैं। काम हुआ बिना ही ईई एसएल बाथम ने कंपनी को 1.12 करोड़ रुपये का भुगतान कर दिया था। लोकायुक्त ने इस मामले में 13 नवंबर 2020 को एफआइआर दर्ज की है, लेकिन विभाग ने किसी को इसकी जानकारी नहीं लगने दी।

जांच में यह आया सामने

उपयंत्री एमडी गौड़ सीवर प्रोजेक्ट में पदस्थ ही नहीं थे, बल्कि वे स्टोर इंचार्ज थे। यह फर्जी एंट्री करने के लिए उत्तरदायी हैं। अप्रैल 2015 में कार्यपालन यंत्री विनोद कुमार छारी ने सब डिवीजन परियोजना को माप पुस्तिका क्रमांक 105 जारी की गई थी। मेजरमेंट के लिए 26.09.2015 को सहायक यंत्री केजी सक्सेना ने उपयंत्री एमडी गौड़ को जारी की थी। इसमें पेज क्रमांक 24 से डब्ल्यूबीएम और गिट्टी मुरहम व काम्पेक्शन के संबंध में हे जिसमें उपयंत्री एमडी गौड़ ने मापांकन दर्ज किए हैं। पेज नं. 26, 27 पर एमडी गौड़ाााा ने हस्ताक्षर करने के बाद काटा है। इस पर हस्ताक्षरों के नीचे 19.09.2015 अंकित है। पेज 85 पर हस्ताक्षर काटा है जिस पर 25.05.2016 अंकित है जिसे ओवरराइट किया गया है। पेज 28 के माप पर गौड़ ने 22.09.2015 को हस्ताक्षर किये हैं। अब इसमें कमाल की बात यह है कि गौड़ को माप पुस्तिका जारी ही 22.09.2015 को की गई थी। पुस्तिका जारी होने के पहले ही गौड़ ने मापांकन कर डाला। कार्यपालन यंत्री को कार्य के 10 प्रतिशत का सत्यापन करना था जो नहीं किया। इसके साथ ही मापांकन पुस्तिका में जगह-जगह पर इस तरह की गड़बड़ी जांच में सामने आई है। इसमें इस तरह से मापांकन किया गया है जो व्यवहारिक रूप से संभव ही नहीं है। इसके आधार पर पाया गया है कि कार्यपालन यंत्री एसएल बाथम, सहायक यंत्री केजी सक्सेना, उपयंत्री एमडी गौड़, उपयंत्री डीपी सिंह और ग्वालियर की ठेकेदार कंपनी मैसर्स जैन एंड राय ने मिथ्या प्रविष्टियां की हैं।

आजीवन कारावास की सजा का है प्राविधान

लोकायुक्त ने चारों अधिकारी और ठेकेदार कंपनी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7, आइपीसी की धारा 120बी, 420, 467, 468 और 471 के तहत मामला दर्ज किया है। धारा 120बी आपराधिक षडयंत्र की धारा है जिसमें सात साल की सजा हो सकती है। वहीं धारा 420 में भी साल साल तक की सजा है। शासकीय दस्तावेजों के कूटकरण की धाराएं 467, 468 और 471 में से 467 में आजीवन कारावास की सजा का प्राविधान है। धारा 467 व्यक्तिगत लाभ हासिल करने के लिए सरकारी दस्तावेजों के कूटकरन की धारा है।

दोगुनी हो गई प्रोजेक्ट की लागत, इसका जिम्मेदार कौन!

सीवर प्रोजेक्ट जब शुरू हुआ था तब इसकी लागत 60 करोड़ रुपये थी। 10 साल से भी ज्यादा समय बीत जाने के बाद यह प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया गया और इसकी लागत 100 करोड़ रुपये के ऊपर पहुंच गई। जांच का विषय यह भी है कि प्रोजेक्ट में देरी का जिम्मेदार कौन है। पीएचई के ईई एसएल बाथम हर समीक्षा बैठक में बजट न होने का रोना रोते नजर आते हैं। उनके काम से कैबिनेट मंत्री और स्थानीय विधायक यशोधरा राजे सिंधिया भी खफा हैं और समीक्षा बैठक में कई बार उन्हें बुरी तरह से फटकार भी लग चुकी है। वहीं दूसरी ओर हाल ही में कुछ दिन पहले शासन ने झील संरक्षण योजना के लिए करीब 111 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की है। यदि इस योजना में ऐसे ही भ्रष्टाचार चला तो शासन के इन रुपयों का भी भ्रष्टाचार भेंट चढ़ने के आसार हैं।

इनका कहना है

अभी आरोप साबित नहीं हुए हैं। हमारा पक्ष सुना ही नहीं गया है। जब मामले की विवेचना होगी तो उसमें सारी सच्चाई सामने आ जाएगी।

एसएल बाथम, ईई, पीएचई।

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