भोपाल। मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय के चुनावों को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं, लेकिन भारतीय जनता पार्टी अंदरूनी तौर पर अलग ही चुनौती का सामना कर रही है। उसे राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया के करीबियों को भी मौका देना है, वहीं पहले से तैयारी कर रहे संगठन के नेताओं का दबाव भी है। फिलहाल सभी 16 स्थानीय निकायों पर भाजपा का कब्जा रहा है, जिसे बरकरार रखने के लिए भाजपा युवाओं को मौका देने का मन बना चुकी है।पार्टी इन स्थानीय चुनाव के जरिए ही भाजपा में पीढ़ी परिवर्तन काना चाहती है,ताकि अगले दो दशक के निए नया नेतृत्व तैयार किया जा सके।
भाजपा भले ही दावा करती रही है कि सिंधिया खेमा पार्टी में पूरी तरह घुल-मिल चुका है, लेकिन विधान सभा उपचुनाव के परिणाम आने के बाद भी इसके लक्षण नहीं दिख रहे हैं। अब भी पार्टी में सिंधिया समर्थकों और पुराने कार्यकर्ताओं में एकरसता शेष है। इसके संकेत निकाय चुनावों में चयन प्रक्रिया से लेकर टिकट वितरण ,कैबिनेट और संगठन पदाधिकारियों के चयन में देखने को मिल रहे हैं। संगठन के सामने दोनों मामलों में संतुलन की चुनौती बनी हुई है। भाजपा ने पीढ़ी परिवर्तन को फोकस करते हुए युवाओं को अधिक टिकट देने का मन बना लिया है। सूत्र बताते हैं कि उपचुनाव की तर्ज पर सिंधिया खेमा मनचाहे टिकट के मूड में हैं, वहीं भाजपा के पुराने दिग्गज अपने करीबियों के लिए जोर-आजमाइश कर रहे हैं। साथ ही संगठन में भी संतुलन के साथ नई टीम उतारनी है।
युवा कार्ड ने बढ़ाई मुश्किलें
दरअसल, भाजपा 2023 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले प्रदेश में युवाओं को जाड़नेे के लिए बड़ी तैयारी कर रही है। सिंधिया खुद को युवा नेतृत्व के तौर पर पेश कर रहे हैं, तो प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा अपने कार्यकाल में पार्टी की सत्ता वापसी, उपचुनाव में भारी जीत और कांग्रेस में लगातार सेंध से मजबूत हुए हैं। वह अपनी टीम में भी युवाओं को मौका देकर पार्टी को नई ऊर्जा देने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सिंधिया खेमे को लेकर उनका रूख स्पष्ट न होने से संशय के बादल हैं। सिंधिया खेमा चाहता है कि जब युवाओं को मौका देना है, तो उनके साथ भाजपा ज्वाइन करने वालों में कई युवा चेहरे हैं, जिन्होंने उपचुनाव में भारी अंतर से सीट जिताकर भाजपा के खाते में जोड़ी है। ऐसे में उन्हें मौका दिया जाए।
इनका कहना
भाजपा में केवल और केवल जनता का फैक्टर होगा,कार्यकर्ताओं की भावना होगी। इसके अलावा सिर्फ अटकलें हैं। ये शैली कांग्रेस की है, भाजपा की नहीं । भाजपा में सामूहिक निर्णय और चिंतन की परम्परा है इसलिए निकाय चुनाव में कोई अलग फैक्टर की गुंजाइश नहीं है।सिंधिया फैक्टर अब भाजपा फैक्टर बन चुका है।
रजनीश अग्रवाल, प्रवक्ता भाजपा मप्र

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