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 कहानी - नारद मुनि हिमालय की तलहटी में ध्यान कर रहे थे। वे ध्यान में इतने गहरे उतर गए कि देवराज इंद्र को डर लगने लगा। इंद्र ने सोचा कि नारद मुनि ऐसे ही ध्यान करते रहेंगे तो मुझसे भी अधिक पुण्यात्मा हो जाएंगे।

देवराज इंद्र ने कामदेव को नारद की तपस्या भंग करने के लिए भेज दिया। कामदेव ने बहुत कोशिश की, लेकिन वह नारद मुनि का तप भंग नहीं कर सके। जब नारद ने देखा कि मैंने कामदेव को पराजित कर दिया है तो नारद अपनी ही प्रशंसा में डूब गए।

इस घटना के बाद नारद मुनि सभी से कह रहे थे, ‘मैंने कामदेव को जीत लिया है। काम पर मैंने गुस्सा नहीं किया तो मैंने गुस्से को भी जीत लिया। इंद्र की संपत्ति नहीं चाहिए, मैंने तो लोभ को भी जीत लिया।’

नारद मुनि एक दिन कैलाश पर्वत पहुंच गए। वहां भी उन्होंने शिवजी के सामने खुद का गुणगान किया और कहा, ‘मैंने काम को जीत लिया।’


शिवजी ने मुस्कान के साथ कहा, ‘आपके मुख से लोग रामकथा सुनना चाहते हैं, लेकिन आप तो लगातार कामकथा सुना रहे हैं। नारद आपने मुझे तो ये सब बता दिया, लेकिन विष्णुजी से ये बातें मत कहना।’

किसी को कोई काम करने के लिए मना करो तो वह वही काम जरूर करता है। नारद मुनि भगवान विष्णु के पास पहुंच गए। विष्णुजी के सामने भी नारद खुद का गुणगान करने लगे।

विष्णुजी समझ गए कि नारद मुनि को अहंकार हो गया है। उन्होंने अपनी माया से नारद मुनि का घमंड तोड़ दिया।

सीख - तपस्या करना, परिश्रम करना, सफलता हासिल करना अच्छी बात है, लेकिन सफल होने के बाद अहंकारी न बनें। जो लोग अपनी सफलता पर अहंकार करने लगते हैं, उनकी योग्यता कम होने लगती है। अपनी योग्यता में बढ़ोतरी के लिए स्वभाव में विनम्रता बढ़ानी चाहिए। नारद मुनि जैसे संत को अहंकार हो गया तो भगवान ने उनका भी अहंकार तोड़ दिया, हम तो मनुष्य हैं, हमें सावधान रहना चाहिए।

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