केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना" प्रधानमंत्री आवास योजना" वास्तव में गरीबों के लिये कितनी सौभाग्यशाली और हितकर है?इस पर यदि हाल ही में एक दैनिक ने जो सनसनीखेज खुलाशा और ब्रैकिंग न्यूज प्रकाशित कर सनसनी फैला दी है!उसके अध्ययन से तो यही लगता है कि हर युग की तरह इस आर्थिक और घोटालेबाज युग में भी गरीबों की गरीबी का मजाक बदस्तूर जारी है! खबर के अनुसार खबर मुरैना नगर पालिक निगम द्वारा कम खर्चों पर गरीबों को योजना के तहत पक्के घर आंवटन की है! मगर यह आश्चर्य कम घोटाले का ज्यादा विषय है कि 1069 गरीब लोगों को आंवटन के लिये स्वीकृत किये गये आवासों में से लगभग आधे लोग अपात्र,फर्जी और साधन सपन्न हैं! इस सूची में पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष,पूर्व पार्षदों के पुत्र व खुद पूर्व पार्षदों तक के नाम शामिल हैं!सबसे हैरत अंगेज यह है कि पूर्व में नगर पालिक परिषद मुरैना में उच्च पदों पर अपनी सेवा दे चुके अधिकारियों जिनकी करोड़ों रुपयों की चमचमाती आलीशन कोठियां जो गरीबों का आठों पहर खुलेआम मजाक उड़ा रही हैं, उनकी औलादों के नाम भी प्रधानमंत्री गरीब आवास योजना में आंवटन सूची में शामिल हैं! मामला गंभीर और हद की सरहद को पार तब कर जाता है तब इन गरीबों की सूची में वर्तमान में प्रदेश की दो नगर पालिका जोरा और बानमोर के प्रभारी मुख्य नगर पालिका अधिकारी के बेटा जो खुद नगर पालिक निगम मुरैना में अच्छे पद पर कार्यरत है का नाम भी गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वालों में मौजूद है!इतना ही नहीं अन्य सरकारी नोकरी शुदा लोगों के पुत्र व परिजनों के नाम भी प्रधानमंत्री गरीब आवास योजना में दावोदारों की सूची में प्रमुखता बनाये हुये हैं। जबकि बहुत से पात्र गरीब जिनके चेहरों पर कम पैसों में आवास मिलने की योजना की खबर सुनकर निखार और तंदुरस्थी की आशा भरी झलक खिलने लगी थी, वे अपना घर -अपना घर की रट लगाये हुये नगर निगम के चक्कर पर चक्कर लगाकर अपनी चप्पलें घिस रहें और अपना खून फूंक रहे हैं,उन्हे कोई भी संतोषजनक उत्तर कोई जिम्मेदार देने को तैयार ही नहीं हैं !क्योंकि यक्ष प्रश्न तो यही है कि वे जिम्मेदार अपनी सीट पर पहले मिल तो जायें? और मिल गये तो वजाय जबाव देने के गरीबों को लताड़ते हुये ही दिखेंगे!
अब ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिरकार यह चमत्कार हुआ कैसे कि योजना में आधे गरीब गायब और आधे अपात्र शामिल कैसे हो गये!सन् 2016 में बनी इस सूची में क्या केवल निगम के अधिकारी और कर्मचारियों ने ही अपनी अस्मिता और स्वाभिमान पैसों की चमक में बिक्रय कर दिया? या फिर इसमें अन्य सरकारी अमले के अधिकारी और कर्मचारियों ने भी खुद को नीलाम कर दिया था! क्योंकि सरकारी नोकरी, जनप्रतिनिधी, सपन्नशाली और भव्य आलीशान कोठियों के मालिक होते हुये इन लोगों ने प्रधानमंत्री आवास योजना के आंवटन में घुसपैठ कैसे कर ली?जी हां सवाल वहीं का वहीं है कि साधन सपन्न होते हुये इनका नाम सूची में पात्रता होने की सबसे जरुरी शर्त गरीबी रेखा का राशन कार्ड इनका कैसे और क्योंकर बन गया? जबकि देश के लगभग सभी जिलों में गरीबी की दम घोंटूं जिंदगी जी रहे अहसाय 70-80 साल के बुजुर्ग पुरुष और महिलायें गरीबी रेखा सूची में अपना नाम दर्ज करवाने और गरीबी रेखा का राशन कार्ड बनवाने के लिये एसडीएम,एसडीओ,तहसीलदारों के यहां चक्कर पर चक्कर काट रहे हैं ,कुछ को छोड़ दें तो अधिकांस
लोग निराश ही लोट रहे हैं! क्योंकि राशनकार्ड तो सपन्नों के बन रहे है,अब क्यों बन रहे हैं ये बताने की जरुरत शायद अब नहीं है!यहां उल्लेखनीय है कि सरकार गरीबों को जिंदा बनाये रखने के लिये गरीबी राशनकार्ड पर भारी सब्सिडी देते हुये बहुत सस्ते में राशन मुहैया कराती है!इस खबर के खुलाशे से अब ये स्पष्ट हो गया कि अब तो ये साधन सपन्न सरकार द्वारा गरीबों को दिये जाने वाले सस्ते अनाज,तेल और चीनी,नमक चट कर रहे थे! लेकिन अब ये सीमेंट,रेत और लोहे के सरियों से बने मकान भी डकार रहे हैं, सच भी भ्रष्टाचार के इस युग में "हराम का चंदन पर पोत मेरे नन्दन" वाली कहावत चरितार्थ हो रही है!क्योंकि ये तो तय है कि गरीबों के निबाले और हकों पर डाका डालने वाले इन फर्जी गरीबों को शर्म भी तो नहीं आती?
लेखक
श्री गोपाल गुप्ता

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