शिवपुरी नरवर तहसील में अतिवृष्टि के साथ आई बाढ़ से कई परिवार बेघर हो गए हैं। सबसे ज्यादा आदिवासी परिवार प्रभावित हुए हैं। बाढ़ में झोपड़ियां और कच्चे मकान ढह जाने के बाद 150 आदिवासी परिवारों ने जंगल में डेरा डाल लिया है। बाढ़ जैसे हालातों से फिर से न गुजरना पड़े, इसलिए डर के कारण जंगल में ऊंची जगह पर सुरक्षित डेरा डाल लिया है।
जंगल में आशियाना बनाकर रह रहे आदिवासियों ने बताया कि रात 3 बजे अचानक बाढ़ का पानी बढ़ने लगा था। यह देखकर बच्चों को गोद में उठाकर जगल की तरफ भागने लगे और किसी तरह अपनी जान बचा ली। बाढ़ का पानी शांत हुआ तो वापस घरों की तरफ लौटकर आए लेकिन सैलाब में गृहस्थी का सामान बह चुका था। राशन से लेकर कपड़े, बर्तन कुछ भी नहीं बचा। झोपड़ियां व कच्चे मकान तबाह हो दिए। यह आदिवासी परिवार सिंध नदी किनारे बसे हुए थे। जैसे ही मड़ीखेड़ा बांध के गेटों से पानी छोड़ा, यह परिवार भी चपेट में आ गए और सब खत्म हो गया।
खोड़न के जंगल वाले रास्त पर घाटी के ऊपर 200 से अधिक आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां बनीं
दैनिक भास्कर टीम मंगलवार को पीपल खेड़ी गांव पहुंची। यहां खोड़न के जंगल की ओर जाने वाले रास्ते पर घाटी ऊपर 2 सैकड़ा से अधिक आदिवासी परिवार झोंपडिय़ां बनाकर रहने लगे हैं। महिला गयासो आदिवासी ने बताया कि जब बाढ़ से पीड़ित हुए तो मंत्री आए। हमारे यहां पानी में अधिक भीगने के कारण सुरेश आदिवासी की मृत्यु हो गई थी। मंत्री ने उसे 12000 दिलाने का आश्वासन दिया और कहा कि आपको खाद्यान्न आदि भी उपलब्ध कराएंगे। लेकिन उसके बाद न तो मंत्री आए न ही 12000, न ही किसी अधिकारी ने अभी तक हमारी सुध ली है। आदिवासी महिलाओं ने बताया कि 15 दिन से कुछ युवक मदद करने आ रहे हैं। रामलखन सिंह अपने लोगों के संग आकर खाने-पीने का सामान दे जाते हैं। महिला राजकुमारी आशा आदि ने बताया कि कुछ युवक खाने की व्यवस्था कर रहे हैं।
जंगल में भी संकट... हटाने के लिए पहुंचा वन महकमा
आपदा के मारे आदिवासी परिवार जंगल में डेरा डालकर रहने लगे हैं। इस बात का पता चला तो वन विभाग का अमला उन्हें हटाने के लिए पहुंच रहा है। 1 दिन तो झुग्गी-झोपड़ी भी हटा दीं। आदिवासियों का कहना है कि बाढ़ ने घर छीन लिए तो जंगल में रह रहे हैं। अब यहां भी हमें वन विभाग की टीम हटाने आ जाती है। आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है कि अब जाएं तो जाएं कहां जाएं।
महिला बोली- नहर का गंदा पानी पीना मजबूरी
महिला राजकुमारी का कहना है कि हम पीने के पानी के लिए भी तरस रहे हैं। हमें नहर का गंदा पानी पीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, वह भी 4 किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है। यहां पर हम जंगल में छोटे-छोटे बच्चों के साथ रह रहे हैं, लेकिन किसी भी प्रशासनिक अधिकारी ने हमारी सुध नहीं ली। {महिला कृष्णा का कहना है कि हम रन्नौद से 10 साल पहले गांव में आए थे। जहां हमने अपना आशियाना बना लिया था, लेकिन बाढ़ ने तबाही मचा दी। आज हम खाने और पीने के पानी के लिए दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। ऐसे दिन भगवान किसी को न दिखाए महिला आशा आदिवासी का कहना है कि यहां आए हमें 10 से15 दिन हो गए हैं और किसी ने भी हमारी खाने पीने की व्यवस्था नहीं कि हमारे बच्चे बीमार हैं। इलाज कराने के लिए पैसे तक नहीं हैं। यहां से हमें 20 किलोमीटर दूर अस्पताल है, पैदल जाना मुश्किल होता है।

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