3 महीने की बच्ची को मां के साथ खाट पर लेटी हालत में ही लाए; 95 साल की बुजुर्ग को गोद में उठाया
गुना जिले में शनिवार का दिन रेस्क्यू ऑपरेशन का रहा। एक तरफ बमोरी क्षेत्र के सोढ़ी गांव में NDRF ने 200 लोगों को रेस्क्यू किया। वहीं, SDRF ने सिंध नदी के उफान में फंसे पीलीघाटा में मंदिर के पुजारी को सुरक्षित निकाला। सोढ़ी में चलाए गए रेस्क्यू ऑपरेशन में सबसे उम्रदराज 95 वर्ष की बुजुर्ग का और सबसे कम उम्र की 3 महीने की बच्ची का रेस्क्यू किया। बच्चे के साथ महिला को खटिया पर ही लेकर आना पड़ा। सभी लोगों को छबड़ा के राहत शिविर में रखा गया है। इससे पहले शुक्रवार को शहर में 10 लोगों को SDRF ने निकाला था।
शुक्रवार दोपहर बाद सोढ़ी गांव के लिए निकले। पहले बमोरी क्षेत्र में जो परिस्थितियां बन रहीं थी, वह सब देखा। इसके बाद पहली बार सोढ़ी के लिए रवाना हुए, तो धरनावदा के आगे पुलिया पर बाढ़ आई हुई थी तो वहीं अटक गए। आगे नहीं जा पाए। उसके बाद में बांसाहेड़ा और सानई की तरफ से जाना पड़ा। यहां से रास्ता लंबा था। यह साफ़ था कि फतेहगढ़ से तो जा नहीं पाएंगे, क्योंकि वहां जाम था। यह तय हो गया था कि छबड़ा की तरफ से जाकर ही रेस्क्यू किया जा सकता है। जब छबड़ा के पास पहुंचे, तो वहां 3-4 किमी पहले पुलिया बनी थी, वह भी चढ़ी हुई मिली। वहां रात 8 बजे के आस-पास पहुंचे। काफी देर तक वहां भी खड़े रहे। उस पुलिया के पानी को निकलने में भी काफी समय लग रहा था। वहां से अगर लौट आते तो आज का काम नहीं हो पता। फिर हमने तय किया की कैसे भी जाएंगे।
वहां पूछा तो यह पता चला कि पुलिया की एक तरफ के जो खेत हैं,वो थोड़े ऊंचे हैं। उन खेतों से दूसरी तरफ जाया जा सकता है। वहां से सभी लोगों ने जूते उतारे और खेतों से निकले। खेतों में भी घुटनों तक पानी-कीचड़ तो था ही। 2 किमी से ज्यादा पैदल चलना पड़ा। उसके बाद पुलिया पार हो पायी। पहले से ही राजस्थान के छबड़ा कलेक्टर और SP से बात की हुई थी, तो उनकी गाड़ियां लेने आ गईं। उनके अधिकारी भी आ गए थे। वहीं, राजस्थान में NDRF की टीम भी मिल गयी थी। इधर, मध्यप्रदेश में NDRF टीम को भी बता दिया था कि कहाँ आना है। वह भी पीछे से ही आ रही थी। वो भी उसी पुलिया के पॉइंट पर आकर अटक गयी थी। लेकिन यह था कि रात में इन्हें भी क्रॉस करवा लेंगे। देर रात में सभी लोग जहां बेस कैंप बनाना था वहां पहुंच गए। जिस कैलाशपुरी गांव में कैंप कर रेस्क्यू ऑपरेशन करना था, वहां भी काफी पानी भरा हुआ था। चारों तरफ अन्धेरा था। इसलिए सभी ने यह तय किया की सुबह ही रेस्क्यू करेंगे। अभी काफी मुश्किल होगी।
सुबह 5 बजे से ऑपरेशन शुरू हुआ। राजस्थान और मध्यप्रदेश की NDRF पहुंच गई थी। हेलिकॉप्टर के लिए भी बता रखा था ,वहां से भी क्लीयरेंस हो गया था कि 8 बजे वह पहुंचकर ऑपरेशन चालू कर देंगे। पर हेलिकॉप्टर में कम लोग ही आ सकते हैं ,तो नाव की व्यवस्था भी की हुई थी। नाव चलने ही वाली थी कि हेलिकॉप्टर आ गया। इसी दौरान एक और समस्या आ गई। रात में पानी रुक गया, तो गांव वाले आने को तैयार नहीं हुए। वो कहने लगे कि पानी उतरने लगा है, इसलिए हम अब नहीं आएंगे। एक तरफ हेलिकॉप्टर ऊपर उड़ रहा था रेस्क्यू के लिए और इधर गांव वाले मना करने लगे। हेलिकॉप्टर को ज्यादा रोका भी नहीं जा सकता। गांव वालों को कलेक्टर और हमने मौसम की स्थिति और क्या उनके लिए व्यवस्था की गयी है, वो सब बताया गया। खाने और रुकने की व्यवस्था है, तब जाकर वे संतुष्ट हुए।
उसके बाद हेलिकॉप्टर से पहली खेप लिफ्ट कराई गयी। इधर, नाव तैयार हो गयीं थी, उससे भी लोगों को निकलना शुरू हुआ। सभी को स्कूल में बने कैंप में उतरा गया। इसी बीच फिर ग्रामीण मना करने लगे। हेलिकॉप्टर को वह स्कूल दूर पड़ रहा था। उनका कहना था कि कोई पास का पॉइंट बनाइये जहां उतरा जा सके, क्योंकि फ्यूल बहुत ख़त्म होता है दूरी में। ऐसे में फिर ज्यादा चक्कर नहीं लग पाएंगे। तुरंत ही पास में तालाब पार करके एक खेत था, वहां तय किया गया। उस खेत पर हेलिकॉप्टर से सबको उतारना शुरू हुआ। हेलिकॉप्टर ने 6 राउंड लगाए। इसमें लोगों को लिफ्ट करके लाया गया।
इस दौरान 95 वर्ष की वृद्ध महिला को लाया गया। उनसे तो चलते भी नहीं बनता था। NDRF की टीम ने उन्हें गोदी में उठाकर कैंप तक पहुंचाया। एक महिला और उसके 3 महीने के बच्चे को लाने में परेशानी आ रही थी, तो उन्हें खटिया पर ही लाया गया। उन्हें नाव पर ही खटिया पर लिटाकर लाया गया। इसी तरह से लगभग 200 लोग रेस्क्यू किये गए। कैंप पर ही गाड़ियां तैयार थीं, जिससे उन्हें छबड़ा में बनाये गए राहत शिविर में पहुंचाया गया। जो बुजुर्ग महिला, जो माँं और उसका बच्चा था, उन्हें सिविल हॉस्पिटल ही भिजवा दिया गया। 4 घंटे में रेस्क्यू ऑपरेशन पूरा किया गया। लेकिन इसकी तैयारियों, पूरा रेस्क्यू ऑपरेशन और उसके बाद राहत शिविर तक का पूरा ऑपरेशन लगभग 20 घंटे में पूरा हुआ।"


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