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गांधी जयंती स्पेशल:गांधीजी ने जाे चरखा जेल में डिजाइन किया और सूत काता, वह 82 साल से ग्वालियर के सिंघल परिवार ने सहेज रखा है



 ग्वालियर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कभी ग्वालियर नहीं आए, लेकिन कुछ परिवार ऐसे हैं जिन्होंने उनसे जुड़ी यादों को दशकाें से सहेजकर रखा हैं। गांधीजी द्वारा डिजाइन किया गया चरखा ही नहीं खादी पर किए उनके ऑटोग्राफ और आजादी के बाद उनकी याद में भारत सरकार द्वारा निकाला गया चांदी का सिक्के को भी इन परिवाराें के सदस्य पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजते आ रहे हैं। 2 अक्टूबर काे गांधीजी की जयंती पर पढ़िए ऐसे ही दाे परिवाराें की कहानी...

1938 से पीढ़ी दर पीढ़ी संभाल रखा गया है ये चरखा

बात 1938 की है। उस समय महात्मा गांधी को अंग्रेज सरकार ने येरवड़ा जेल में कैद कर रखा था। बापू जेल में खाली समय में चरखा चलाना चाहते थे, लेकिन उस चरखे का आकार इतना बड़ा था कि उसे चलाना संभव नहीं था। कई प्रयास के बाद वह ऐसा चरखा बनाने में कामयाब रहे, जिसे फोल्ड कर पेटी की तरह रख सकते थे।

बाद में इस फोल्डिंग चरखे का नाम गांधीजी के नाम से पड़ गया। बाद में गांधीजी द्वारा डिजाइन किया गया चरखा बाजार में आ गया, क्याेंकि वर्ष 1905 में स्वदेशी आंदोलन शुरू हाेने से खादी की मांग बढ़ गई थी। मेरे पिता कृष्ण सहाय को उनके दादा ने यह चरखा दिया।

वर्ष 1938 में एक बार गांधीजी यूपी के असनेरा गांव के सत्याश्रम आश्रम आए। गांधीजी ने यहां युवाओं को चरखा चलाते देखा तो वह भी बैठ गए। पिता को फोल्डिंग चरखा चलाकर सूत कातता देखकर वह काफी प्रसन्न हुए। बापू ने भी इस चरखे पर सूत काता। इसके बाद से चरखे को हमारी तीन पीढ़ियाें ने सहेजकर रखा है।

-डॉ.वीके सिंघल, रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर, जीआर मेडिकल कॉलेज

1948 में 10 रुपए में बिका था महात्मा गांधी का एक किलो चांदी का सिक्का

आजादी के बाद 1948 में भारत सरकार ने महात्मा गांधी की याद में 10 रुपए का सिक्का निकाला था। इसमें एक किग्रा चांदी थी। हालांकि यह प्रचलन में नहीं रहा, लेकिन कुछ चुनिंदा ही लोगों ने इस सिक्के काे कलेक्शन के लिए लिया था। मेरे दादाजी स्व. गोविंद लाल आजादी के पहले से गांधीजी से काफी प्रभावित थे इसलिए उन्होंने इस सिक्के को लिया। इसे उन्हाेंने मेरे पिता डॉ. हरी वल्लभ को दिया।

अक्सर दादा जी परिवार में गांधीजी के किस्से सुनाते थे। इस कारण पिता को भी पुराने कलेक्शन एकत्रित करने का शौक जाग गया। एक बार जब वह गुजरात गए तो वहां एक एक्जीबिशन लगी थी। इसमें उनकी मुलाकात 75 वर्षीय काकाजी से हुई। वह एक आश्रम चलाते थे।

उन्होंने कहा कि बेटा मैं तुम्हें अपनी एक विरासत दे रहा हूं, लेकिन शर्त यह है कि इसे संभालकर रखना। पिता ने शर्त स्वीकार कर ली। उन्होंने पिता को खादी पर महात्मा गांधी के ऑटोग्राफ वाला एक टुकड़ा दिया, जिसे पिता ने अभी तक संभालकर रखा है।

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