उन्होंने कहा कि किसान भाई रबी फसलें-सरसों, अलसी, चना, मटर, मसूर एवं गेहूं इत्यादि फसलों की बुवाई के लिए समन्वित पोषक तत्व, प्रबंधन प्रणाली को अपनाये। डी.ए.पी. जैसी खादों के लगातार प्रयोग से भूमि फास्फोरस जैसे तत्वों की उपलब्धता होते हुए भी नहीं मिल पा रही है। रबी फसलों के लिए एन.पी.के. 12ः32ः16 या 10ः26ः26 या अन्य संयोजनों का उपयोग कर रबी फसलों की बुवाई में करें तथा बुवाई करने से पहले बीजोपचार के लिए जैव उर्वरकों राइजोबियम दलहनी फसलों में, एजोटोबैक्टर अनाज वाली फसलों में तथा स्फूर घोलक जीवाणु (पी.एस.बी.) सभी फसलों में 250 ग्राम प्रति 10 किलो बीज की दर से बीजोपचार करें तथा 2-3 कि.ग्रा. 50 किलो भुरभुरी मिट्टी/वर्मी कम्पोस्ट/नाडेप खाद में मिलाकर बुवाई से पूर्व 01 एकड़ मिट्टी में मिला दें जिससे प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन तथा पूर्व से स्थिर फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ जाती है। इससे उर्वरकों का अंधाधुंध प्रयोग भी नहीं होगा और लागत व्यय पर भी कमी हो सकेगी।
वैज्ञानिक (पौध संरक्षण) डॉ.जे.सी.गुप्ता द्वारा रबी फसलों के बीजोपचार तथा टमाटर फसल में कीट-व्याधि नियंत्रण के बारे में तकनीकी जानकारी दी गई। कृषि विज्ञान केंद्र के प्रमुख डॉ.एस.पी.सिंह द्वारा किसानों से आग्रह किया है कि किसान डीएपी के पीछे न भागकर बाजार में उपलब्ध डीएपी के विकल्प सिंगल सुपर फॉस्फेट, एन.पी.के. 12ः32ः16 या 10ः26ः26 आदि का वैज्ञानिकों की अनुशंसा के अनुरूप प्रयोग करके फसलों से भरपूर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
सहायक कृषि यंत्री अंकित सेन द्वारा कृषकों को कस्टम हायरिंग सेवा तथा कृषि यंत्रों के बारे में विस्तार से समझाते हुए कृषकों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। इस अवसर पर कृषक श्री सियाराम पटेल ने कृषि वैज्ञानिकों के प्रयासों की सराहना करते हुए कृषि जानकारी को उपयोग बतलाया। श्री हरिशंकर धाकड़ सरपंच तेंदुआ द्वारा क्षेत्र के कृषकों के लिए संगोष्ठी को उपयोगी बतलाया तथा दी गई जानकारी को अमल में लाये जाने का आश्वासन भी दिया। संगोष्ठी में एक सैकड़ा से अधिक कृषक/कृषक महिलाओं की सहभागिता रही।
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