भारत की जनसंख्या का 8.6 फीसदी यानी लगभग 11 करोड़ की जनसंख्या आदिवासियों की है. देश की जनसंख्या के हिसाब से ये एक बड़ा हिस्सा है जिसे नजरंदाज किया जाता रहा है. भारत में अनसूचित आदिवासी समूहों की संख्या 700 से अधिक है. साल 1951 के बाद से आदिवासियों को हिंदू आबादी के तौर पर पहचान मिली है उससे पहले इन्हें अन्य धर्म में गिना जाता था. भारत सरकार ने इन्हें अनसूचित जनजातियों के रूप में मान्यता दी है. आदिवासियों की देश में सबसे ज्यादा आबादी मध्य प्रदेश में रहती है. इसके बाद ओडिशा और झारखंड का नंबर आता है.
हाशिए पर आदिवासी समाज
देश की आम जनता से आदिवासी जनता हमेशा से ही अलग रही है. आदिवासी समाज हाशिए पर खिसकने कारण भी हैं जिनको लेकर वो लड़ते भी हैं. देश में उद्योग खनन के लिए जमीन की जरूरत होती है तो ऐसे में आदिवासियों की जमीन को छीन लिया जाता है. इसके साथ ही आदिवासी लोग भौगौलिक दृष्टि से जंगल में निवास करते हैं और हमेशा से ही जमीन के लिए संघर्ष करते नजर आए हैं. आदिवासियों के लिए बड़ा मुद्दा विस्थापन का रहा है. देश के विकास की जब भी बातें होती है तब आदिवासी अपने आप सामने आ जाते हैं, देश के विकास का रास्ता आदिवासी की जमीन से होकर ही गुजरता है. आज भी इनकी सामाजिक और आर्थिक चीजों में कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ है. ये समाज आज भी पिछड़ा है और कहीं-कहीं तो ये प्रारम्भिक छोर पर ही खड़े हैं.
आदिवासियों का पिछड़ापन

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