दिलों में आंधियां तूफान रखना आंखों में, अभी जिहाद का जंगल उजड़ना बाकी है। रुला दिया हमें काश्मीर की एक फाइल ने, अभी तो कितने ही, नॉवेल को पढना बांकी है। यह पंक्तियां जब शायर सुकून शिवपुरी ने पढ़ी तो काव्य पाठ में मौजुद लोगों ने देशभक्ति की जय कार के साथ तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी।
दरअसल होली के अवसर पर हर साल साहित्य प्रेमी स्वर्गीय वल्लभ दास गोयल की स्मृति में हास्य कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। शनिवार रात गांधी चौक गोयल कॉम्पलेक्स परिसर में आयोजित हास्य व्यंग्य कवियों की रचनाओं ने जमकर वाणी रंग बिखेरे। आरंभ में सभी कवियों का स्वागत आयोजन समिति के उमेश गोयल और गोयल परिवार के सदस्यों ने कवियों का माल्यार्पण से किया।
बेटियों की रक्षा और उनकी सुरक्षा पर केंद्रित काव्य पाठ करते हुए शायर सलीम बादल ने कहा कि-ता उम्र हंसती और हंसाती हैँ बेटियां, रुख़सत के वक्त सबको रुलाती हैं बेटियां, पापा की गोद में कभी मम्मी की गोद में, दोनों पर अपना प्यार लुटाती हैं बेटियां।
विदिशा के हास्य व्यंग्य कवि सन्तोष शर्मा सागर विदिशा ने कहा कि- भेडि़ए भी शांति के गीत गाने वाले हैं। लगता है देश में चुनाव आने वाले हैं। हास्य व्यंग्य का बडा नाम मुकेश शांडिल्य टिमरनी ने खुद के काले रंग की जमकर आलोचना की और उस काले रंग का मजाक बनाते हुए कहा कि- कौन कहता है यहां काला रंग है, काजल तो गोरिया आंखों में लगाती है।
काली-काली जामुन की बात है निराली प्यारे, काली मावा बाटी देखो पंगत सजाती है। उन्होंने पत्नी को महान बताते हुए कहा कि घर वाले सारे काम, पूरे करो सुबह शाम, बर्तन मांजो तो बजाना नहीं चाहिए। जिंदगी की एक बात कहता हूं साफ-साफ, बीवी गर मारे तो चिल्लाना नहीं चाहिए।
आयोजन में श्रंगार और व्यंग्य के लयबद्ध गीत सुनाते हुए भोपाल से आए कवि धर्मेंद्र सोलंकी ने होली पर कोरोना काल के दौरान पाबंदियों के चलते रंग लगाने के हालात बयां करते हुए कहा कि-लक्ष्य तलक उसने मेरे हाथों को जाने नहीं दिया, गोरे-गोरे, कोरे गालों को सहलाने नहीं दिया, मुँह पर कपड़ा बांधे गौरी फूलन देवी बनी रही,कोरोना के डर से मुझको, रंग लगाने नहीं दिया।
प्रदीप अवस्थी साधक ने गजल सुनाते हुए कहा कि- फूलों में जो खुशबू है, नदियों में जो पानी है। सब उसका करिश्मा है,सब उसकी निशानी है। देता है वही सबको, ये धूप हवा मिट्टी, संसार का एक वो ही सबसे बड़ा दानी है
0 टिप्पणियाँ