लोकसभा चुनाव 2024: भारत में रहने वाले वे लोग जो वोट नहीं डाल सकते
भारत में होने वाले आम चुनाव को दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया कहा जाता है. इन आम चुनाव में क़रीब एक अरब लोग वोट देने के योग्य हैं.
हालांकि, असम में एक ऐसे भी अनोखी कैटेगरी के लोग हैं, जो वोट नहीं डाल सकते. उन्हें डी-वोटर्स या संदिग्ध मतदाता (डाउटफुल वोटर्स) कहा जाता है. असम सरकार के मुताबिक़, इस वक्त ऐसे वोटरों की संख्या क़रीब एक लाख है.
ये वो लोग हैं जिनकी नागरिकता पर सवाल उठाए जा रहे हैं. असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी), सिटीजन अमेंडमेंट एक्ट (सीएए) जैसे नागरिकता से जुड़े मुद्दों के बीच डी-वोटर भी एक मुद्दा है.
डी-वोटर्स की दिक्कतों को समझने के लिए बीबीसी ने असम के करीमगंज और सिलचर लोकसभा क्षेत्रों का दौरा किया.
बांग्लादेश की सीमा से सटे होने की वजह से यहां नागरिकता से जुड़ा मुद्दा, अहम राजनीतिक विषय है.
डी-वोटर्स वोट नहीं दे सकते, ऐसे में उनके पास मतदान का अधिकार नहीं है.
जानकार कहते हैं कि डी-वोटर्स को तय करने की प्रक्रिया भी मनमाने तरीके से की जाती है, इन मामलों के निपटारे में काफी समय लगता है. सिर्फ वोटिंग ही नहीं, इन लोगों को कल्याणकारी योजनाओं से जुड़े लाभ हासिल करने में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है.
समस्या की शुरुआत कैसे हुई ?

असम, बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करता है. ऐसे में राज्य ने कई बार माइग्रेशन झेला है. बहुत सारे लोग युद्ध और उत्पीड़न से बचकर यहां आएं.
साल 1979 में असम के कई संगठनों ने 6 साल लंबा प्रदर्शन शुरू किया. इन संगठनों की मांग थी कि जो लोग बिना उचित दस्तावेज़ों के भारत आए हैं, उनकी पहचान की जाए और उन्हें निर्वासित किया जाए.
मुद्दों को सुलझाने के लिए, ये तय किया गया कि जो लोग 24 मार्च, 1971 यानी बांग्लादेश की आज़ादी के लिए हुए युद्ध से पहले भारत आए हैं उन्हें भारतीय नागरिक के तौर पर मान्यता दी जाएगी. इस तारीख के बाद आने वाले लोग विदेशी होंगे.
साल 1997 में भारतीय चुनाव आयोग ने विदेशी नागरिकों की पहचान के लिए एक अभियान चलाया.
ऐसे लोगों की पहचान कि गई जिनकी नागरिकता संदिग्ध थी, उनके मामलों की शुरुआती जांच के बाद फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में भेज दिया गया.
ये ट्रिब्यूनल्स, अर्ध-न्यायिक निकाय होते हैं, जिनका गठन ये तय करने के लिए किया जाता है कि भारतीय नागरिक कौन हैं.
ऐसे संदिग्ध वोटरों के मामले की सुनवाई होती रहती है और उनके नाम के आगे 'डी' लगा दिया जाता है, उन्हें वोटिंग से रोक दिया जाता है.
हालांकि, ऐसे वोटरों के आंकड़े अलग-अलग हैं, चुनाव आयोग के मुताबिक़, साल 1997 में 3.13 लाख लोगों की पहचान डी-वोटर्स के तौर पर की गई थी.
फरवरी 2024 में असम सरकार की तरफ़ से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मतदाता सूची में क़रीब 97,000 डी-वोटर्स हैं.
'हम हिंदू हैं, कहां जाएं?'
64 साल के मणिन्द्र दास सिलचर में रहते हैं. उनका परिवार बांग्लादेश से यहां आया था
64 साल के मणिन्द्र दास सिलचर में रहते हैं. उनका परिवार बांग्लादेश से यहां आया था. वो साल 1997 में डी-वोटर घोषित किए गए.
हालांकि, वो कहते हैं कि उन्हें इसके लिए आधिकारिक सूचना 16 साल बाद साल 2013 में मिली.
मणिन्द्र बीबीसी से कहते हैं, ''मुझे ये ठीक से याद नहीं कि मेरे पिता कब भारत आए थे. उस वक्त मैं बहुत छोटा था.''
हालांकि, वो ये भी बताते हैं कि जब वो बड़े हुए तो उनके पिता ने उन्हें रिफ्यूज़ी कार्ड दिया. भारत सरकार से
मिले इस कार्ड में लिखा था कि वो लोग साल 1964 में भारत आए थे.
मणिन्द्र दास के बेटे बीरेंद्र दास को आर्थिक मजबूरी की वजह से कॉलेज छोड़ना पड़ा
ट्रिब्यूनल ने मणिन्द्र की उपस्थिति के बिना ही आदेश पारित कर दिया. उन्होंने दो साल डिटेंशन कैंप में बिताए.
वो उस दौर को याद करते हुए कहते हैं, ''एक दिन पुलिस आई और दस्तावेज दिखाने के लिए कहा, मैं उनकी गाड़ी में चढ़ा और उन्होंने मुझे जेल में डाल दिया.''
मणिन्द्र के 22 साल के बेटे बीरेंद्र कहते हैं. इस मामले ने परिवार को आर्थिक तौर पर तोड़ कर रख दिया है, परिवार मदद के लिए दर-दर भटकता रहा. घर की आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से उन्हें कॉलेज भी छोड़ना पड़ा.
वो कहते हैं, ''हम हिंदू हैं जो भारत में रहते हैं. अगर हमें नागरिकता नहीं दी जाती है, तो हम कहां जाएं? पाकिस्तान चले जाएं?''
'मैं बीजेपी का समर्थन करता हूं'
अपने दस्तावेज ढूंढते हरिचरण दास
मणिन्द्र दास के घर के ठीक बगल में हरिचरण दास रहते हैं.
हरिचरण दास कहते हैं कि वो बीजेपी के बूथ लेवल कमेटी के कार्यकर्ता हैं और ज़िंदगी भर पार्टी का समर्थन किया है.
उनका कहना है, ''इस चुनाव में मैंने कई लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया, लेकिन इस बात का दुख है कि मैं खुद ही वोट नहीं दे सका.''
वे कहते हैं, ''एक दिन पुलिस मेरे पास आई और कहा कि आप डी-वोटर हैं. मुझे पता भी नहीं था कि ये डी-वोटर क्या होता है?''
एक कमरे के मकान में रह रहे हरिचरण ने एक बक्सा भरकर दस्तावेज रखे हुए हैं. जब हमने उनसे ट्रिब्यूनल से मिले नोटिस को दिखाने के लिए कहा तो वो काफी देर तक सामान में नोटिस को ढूंढते रहे, लेकिन उन्हें नहीं मिल सका.
हालांकि, हरिचरण एक चुनावी सूची दिखा सके, जिसमें उनके नाम के आगे 'डी' लिखा हुआ था.
‘मैं इस बार वोट नहीं दे सकी’
क्ष्मी इस बार वोट नहीं दे पाईं
ये एक ऐसी कहानी है जो पूरा इलाके में देखने को मिली.
हरिचरण दास के घर के 200 मीटर दूर ही 47 साल के लक्ष्मी दास रहती हैं.
वो कहती हैं, ''मुझे नहीं पता कि मेरे पिता कब भारत आए थे. अब मेरे माता-पिता नहीं रहे. मेरे नाम के आगे 'डी' लिखा हुआ है, इसलिए मैं वोट नहीं दे सकी.''
हालांकि, जो दस्तावेज़ लक्ष्मी ने दिखाए. उनमें एक 1950 के दशक का सर्टिफिकेट भी था जिसमें लिखा हुआ था कि उनके पिता एक भारतीय नागरिक हैं.
‘मैंने कभी वोट नहीं दिया’
जहांआरा को भी विदेशी घोषित किया गया है
ये ऐसा मुद्दा है जो सिर्फ़ हिंदुओं को ही प्रभावित नहीं करता.
सिलचर के बाहरी इलाक़े में हमारी मुलाक़ात जहांआरा बेगम से हुई.
वो ऐसे गांव में रहती हैं जहां ज़्यादातर मुस्लिम आबादी है. वो कहती हैं कि वो यहीं पैदा हुई हैं.
इसके बावजूद वो बताती हैं, ''मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी वोट नहीं दिया है.''
ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जहांआरा को भी विदेशी घोषित किया गया है. जहांआरा ने जमानत हासिल की है इसलिए वो डिटेंशन कैंप या जेल में नहीं बल्कि अपने घर में रह रही हैं.
वो कहती हैं कि वो हमेशा अपने दस्तावेज पास में रखती हैं.
प्रक्रिया में 'मनमर्जी'
डी-वोटर्स से जुड़ी पूरी प्रक्रिया अव्यवस्थित और भ्रम से भरी हुई है. जिन लोगों से हम मिले उनमें से ज़्यादातर के पास अपने केस से जुड़े दस्तावेज ही नहीं थे. कुछ को ये भी नहीं पता था कि उनके मामलों का वकील कौन है.
कानून के जानकार बताते हैं कि कई मामलों में डी-वोटर्स की मार्किंग मनमाने तरीके से की गई और कई मामलों में डी-वोटर्स के परिवार वालों को भारतीय नागरिक मान लिया गया है लेकिन उन्हें संदिग्ध ही माना गया है.
डी-वोटर्स के लिए समस्या सिर्फ वोट न दे पाने की नहीं है. फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पूर्व सदस्य और वकील शिशिर डे कहते हैं, ''कभी-कभी उन्हें राशन और आधार कार्ड हासिल करने में दिक्कत आती है.''
ज़्यादातर मामलों में ट्रिब्यूनल्स ने पाया कि ''डी'' मार्क किए गए लोग भारतीय नागरिक थे.
ऐसे कई मामलों पर काम कर चुकी सिलचर में रहने वाली एडवोकेट तान्या लस्कर कहती हैं, ''आपको ये नहीं बताया जाता कि किस आधार पर आपको डी-वोटर घोषित किया गया है. आपको सिर्फ ये बताया जाता है कि दस्तावेज़ गायब हैं.''
तान्या कहती हैं, "इतना ही नहीं, ये भी नहीं बताया जाता कि कौन से दस्तावेज गायब
हैं."
अलग-अलग ट्रिब्यूनल्स इस मामले के लिए अलग-अलग मापदंडों को मानते हैं, जैसे कि किन दस्तावेज़ों को मानना है और किन्हें नहीं.
शिशिर डे कहते हैं, ''ये सब हाई कोर्ट से नियंत्रित होता है. एक जज चीज़ों को अपने हिसाब से चलाते हैं. दूसरे जज उसमें कुछ संशोधन कर देते हैं.''
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