असम में नागरिकता से जुड़े मुद्दे काफी अहम रहे हैं. साल 2019 में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजंस (एनआरसी) अपडेट किया गया था. बीजेपी के चुनावी वादों में एनआरसी काफी समय से रहा है. हालांकि, इस बार इसे हटा दिया गया है.
असम की पूरी आबादी यानी 3 करोड़ से ज़्यादा लोगों को अपना दस्तावेज़ दिखाना था और ये साबित करना था कि वो साल 1971 से पहले भारत आए थे. 19 लाख लोगों को इससे बाहर कर दिया गया.
सरकार के अलग-अलग विभागों में समन्वय की कमी का एक और उदाहरण ये है कि कुछ डी-वोटर्स का नाम वोटिंग लिस्ट में मिल सकता है.
जैसे, मणिन्द्र दास को विदेश घोषित किया गया है लेकिन उन्होंने इस चुनाव में मतदान किया था. जानकारों का कहना है कि ये दिखाता है कि कैसे पूरी प्रक्रिया ही अव्यवस्थित है.
साल 2019 में बीजेपी सरकार ने विवादास्पद सीएए पारित किया था. इस क़ानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से भारत आए मुस्लिम समुदाय के लोगों को छोड़कर बाकी सभी धर्मों के लोगों को अवैध अप्रवासी नहीं माना जाएगा.
वो नागरिकता के लिए पात्र होंगे, भले ही वो बिना दस्तावेज के आए हों. इसे मार्च से लागू कर दिया गया है. सीएए को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
परिमल शुक्लाबैध कहते हैं, ''एक बार नागरिकता का मुद्दा सुलझ जाए तो डी-वोटर की समस्या भी सुलझ जाएगी.''
हालांकि, हर किसी को इस बात का भरोसा नहीं है.
तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव कहती हैं, ''ये बस एक चुनावी जुमला है. बीजेपी, हिंदू और मुस्लिम को बांटकर वोट पाती है.''
बीरेंद्र दास पूछते हैं, ''बीजेपी ने आख़िर 10 साल में क्या किया है. नेता वोट के लिए ये सब बातें करते हैं, वो लोगों का दर्द नहीं समझते हैं.''
लक्ष्मी दास कहती हैं, ''मोदी भले ही कानून लाए हों लेकिन इससे हमें मदद नहीं मिल रही है. मैं काफी समय से डी-वोटर हूं लेकिन उन्होंने हमारी मदद नहीं की.''
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