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MP में घटिया निर्माण की खुली पोल! 7 जिलों में औचक निरीक्षण, 18 प्रोजेक्ट्स में निकलीं कमियां—अफसरों को अल्टीमेटम

 विशेष ग्राउंड रिपोर्ट: MP PWD में 'ऑपरेशन क्लीन'—7 जिलों की जांच में खुली पोल, 18 प्रोजेक्ट्स पर लटकी तलवार!

भोपाल। मध्य प्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) में वर्षों से चल रहे "कमीशनराज और घटिया निर्माण" के खेल पर आखिरकार सरकारी चाबुक चल ही गया। 5 अक्टूबर को प्रदेश के 7 प्रमुख जिलों में हुई अचानक छापेमारी (औचक निरीक्षण) ने विभाग के अंदरखाने में हड़कंप मचा दिया है। मंत्री राकेश सिंह और प्रमुख सचिव सुखवीर सिंह के निर्देश पर जब 7 मुख्य अभियंताओं (Chief Engineers) की फौज मैदान में उतरी, तो दावों की धज्जियां उड़ गईं—35 में से 18 निर्माण कार्यों में सीधे तौर पर कमियां और घटियापन उजागर हुआ है!

💣 50% से ज्यादा प्रोजेक्ट्स 'डिफेक्टिव'—आखिर कौन है जिम्मेदार?

यह कोई मामूली प्रशासनिक समीक्षा नहीं, बल्कि पीडब्ल्यूडी की विश्वसनीयता पर लगा एक बड़ा सवालिया निशान है। सीहोर, मंडला, मुरैना, धार, सतना, उज्जैन और छतरपुर में जब रैंडम चेकिंग हुई, तो पता चला कि हर दूसरा प्रोजेक्ट मानकों पर खरा नहीं उतर रहा था।

  • 35 में से 18 प्रोजेक्ट्स फेल: सड़कों, पुल-पुलियाओं और सरकारी भवनों के निर्माण में पाई गई कमियों ने अफसरों और ठेकेदारों के गठजोड़ की पोल खोल दी है।
  • किस-किस पर गिरी गाज: PWD की सड़कों/पुलों के 21 काम, PIU के 4 भवन, MPRDC के 6 काम, MPBDC के 3 काम और NH का 1 काम जांच की जद में आया।

⚡ अल्टीमेटम का 'काउंटडाउन': 30 अक्टूबर के बाद बख्शे नहीं जाएंगे अफसर

समीक्षा बैठक में MPRDC के प्रबंध संचालक (MD) श्री भरत यादव का रुख बेहद सख्त रहा। उन्होंने साफ कर दिया है कि लिपापोती का दौर खत्म हो चुका है:

  1. 30 अक्टूबर की डेडलाइन: प्रदेश की सड़कों के सभी छोटे-बड़े गड्ढों को भरने और जानलेवा बने 'ब्लैक स्पॉट्स' को सुधारने के लिए 30 अक्टूबर तक का आखिरी मौका दिया गया है।
  2. लोकपथ ऐप पर 4 दिन की मुद्दत: जनता की शिकायतों को दबाने वाले अधिकारियों को चेतावनी दी गई है कि 'लोकपथ ऐप' पर दर्ज शिकायत का निराकरण हर हाल में 4 दिनों के भीतर होना चाहिए।
  3. सीएम हेल्पलाइन पर फर्जी क्लोजर नहीं: अब कागजों पर खानापूर्ति कर शिकायत बंद कराने का खेल नहीं चलेगा। शिकायतकर्ता की वास्तविक 'संतुष्टि' ही अफसरों की रिपोर्ट कार्ड तय करेगी।

🏆 मंडला में मिसाल, बाकी जिलों में फजीहत!

इस पूरे ऑपरेशन में जहां 18 प्रोजेक्ट्स में कमियां निकालकर ठेकेदारों और ईंजीनियरों को फटकार लगाई गई, वहीं मंडला में मध्यप्रदेश भवन विकास निगम द्वारा बनाए जा रहे नवीन मेडिकल कॉलेज के काम की सराहना हुई। संभागीय प्रबंधक मानवेंद्र सिंह सेंगर, प्रबंधक सुभेश पांडे, मयंक जैन और निर्माण एजेंसी मेसर्स बीपीसी इंफ्रा प्रोजेक्ट्स को बेहतर गुणवत्ता के लिए शाबाशी मिली—जो यह साबित करता है कि नीयत साफ हो तो काम भी नंबर-1 होता है।

🎯 बड़ा सवाल: क्या सुधरेगी व्यवस्था या सिर्फ कागजी खानापूर्ति?

मुख्य अभियंताओं के इस 'सर्जिकल स्ट्राइक' ने यह तो साफ कर दिया है कि सरकार अब ढिलाई के मूड में नहीं है। लेकिन असली परीक्षा 30 अक्टूबर के बाद होगी—क्या सड़कें सचमुच गड्ढा-मुक्त होंगी, या फिर पहली ही बारिश में यह 'सुधार' पानी में बह जाएगा?

संदेश साफ है: ठेकेदारी में मनमानी करने वालों और टेबल पर बैठकर फाइलें पास करने वाले इंजीनियरों के दिन अब लद चुके हैं!

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