अतिवृष्टि और सिंध नदी की बाढ़ में नरवर तहसील का सूडा गांव बुरी तरह प्रभावित हुआ है। गांव में कच्चे घर ढह जाने से करीब 109 परिवार बेघर हो गए हैं। 350 से अधिक महिला, बच्चे और पुरुष इस समय मंडी प्रांगण की टीनशेड को आशियाने के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। इस राहत शिविर में ग्रामीणों के खाने-पीने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। ग्रामीणों ने दैनिक भास्कर को बताया कि केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के दौरे की वजह से रविवार को कई समाजसेवी व प्रशासनिक अधिकारी खाना आदि लेकर आए।
सिंधिया के जाने के दूसरे दिन सोमवार को खाना तो दूर कोई हाल पूछने तक नहीं आया। घर ढह जाने से गृहस्थी का सामान भी बाढ़ में बह गया है। अब रहने की कोई जगह नहीं बची है। सूडा गांव में फिर से जाकर घर बनाकर रहना अब खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि यदि फिर से भारी बारिश हुई तो मुश्किल हो सकती है। दूसरी तरफ पशुपालन विभाग के अधिकारी आए और पीएम के लिए पशुओं के शव मांगने लगे। ग्रामीणों का कहना है कि हम अपनी जान बचाकर भागे, अब मरे जानवर कहां ढूंढने जाएं।
पीड़ितों के लिए अब टीनशेड छत और अनाज की बोरियां ही बिस्तर
कृषि उप मंडी नरवर प्रांगण की टीनशेड में सूडा गांव के परिवार रह रहे हैं। दिन में तो दौड़ भागकर कर फिर से घर बनाने की जुगत में लग रहते हैं। महिलाएं जंगल में लकड़ियां काटने जा रहीं हैं। 109 पीड़ित परिवारों के लिए फिलहला टीनशेड छत और अनाज की बोरियां ही बिस्तर हैं। बरसात होने पर बौछारों का भी सामना करना पड़ रहा है। खाना पीना भी बमुश्किल हो पा रहा है।
नेताजी आए तो लोग खाना लाए, अब कोई नहीं पूछ रहा
सूडा गांव की महिला प्रेमवती आदिवासी अपनी एक साल की बेटी को गोद में लिए मंडी परिसर में खड़ी थी। पूछने पर बताया कि एक नेताजी आए तब तो कई लोग खाना लेकर आ गए। लेकिन सोमवार को कोई खाना लेकर नहीं आया। सूडा गांव में हमारा कच्चा घर ढह गया है, वहां अब कुछ नहीं बचा है। महिला रामकली आदिवासी कहती हैं कि मंडी में टीनशेड में रहकर समय काट रहे हैं। दिन के समय जंगल जाकर लड़कियां काटकर ला रहे हैं, ताकि मडइया (झोंपड़ी) बनाकर रहने लायक स्थिति बन सके। गांव में मकान ढहने से कुछ नहीं बचा। हमारी कोई खैर खबर नहीं ले रहा, खुद ही व्यवस्था जुटा रहे हैं।
महिला उर्मिला आदिवासी ने बताया कि मंत्री आए तो रविवार को लोग खूब खाना लेकर आए। अब भूख लग रही है तो किसी तरह सामान जुटाकर खुद खाना बना रहे हैं। सूडा गांव में बाढ़ आने से पहले हम जान बचाकर भाग आए। गांव में बना कच्चा मकान गिर गया है, अब कहां जाएं, कुछ समझ नहीं आ रहा है।
बाढ़ में सारे मवेशी बह गए, किसी तरह हम लोग अपनी जान बचाकर भागे
साहब सिंह आदिवासी ने बताया कि वह छह दिन से नरवर मंडी की टीनशेड में रह रहे हैं। चारों तरफ पानी से घिरते देख किसी तरह भागकर जान बचा ली। अनाज व कपड़े सभी बह गए हैं। हमारे बकरे-बकरियां और गाय व भैंस भी बह गईं। पशुपालन विभाग वाले अब कह रहे हें कि पीएम करना है, जानवरों के शव ढूंढकर लाओ। अब बाढ़ में जानवरों को कहां ढूंढने जाएं।

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